भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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तृतीयोऽध्यायः १३

नानाजलजपुष्पाभिर्दीर्घिकाभिरलङ्कृते । हंसारावसुसंघृष्टे सारसैः समलङ्कृते ॥ २८ ॥ तस्मिन् स रमते देवः स्त्रीभिः परिवृतस्तदा । हारनूपुरकेयूररशनाद्यैः विभूषणैः ॥ २९ ॥

कोकिलों के मधुर आलाप, जलकुक्कुट के शब्द, भ्रमर के मधुर गुञ्जन, शुक-चातक की ध्वनि से युक्त, नाना जलज पुष्पविशिष्ट दीर्घिकासमूह में हंसध्वनि तथा सारस पक्षियों से समलंकृत उस स्थान में हार, नूपुर, केयूर, कटिभूषण प्रभृति अलंकार से अलंकृत स्त्रीगण से परिवृत वासुदेव रमण कर रहे थे॥२७-२९॥

भूषितानां वरस्त्रीणां चार्वङ्गीणां विशेषतः । क्रीड़ार्थं पद्मपत्रेषु नियुक्तानां यथार्हतः ॥ ३० ॥ तत्तस्मिन् दीयते तासां मिष्टं पानं सुरासवम् । मणिकाञ्चनपात्रेषु नानापुष्पाधिवासितम् ॥ ३१ ॥

विशेषतः मधुर अवयवों वाली, श्रेष्ठ रमणीगण की क्रीड़ा हेतु यथायोग्य पद्मपत्र के पात्रों में (दोनों में) मीठा पान रखा था। मणिकाञ्चन के पात्रों में नाना पुष्पों की गन्ध से सुवासित सुरा, आसव रक्खा था॥३०-३१॥

वृन्तैश्च सहकाराणां भग्नैर्नीलोत्पलैरपि । एतस्मिन्नन्तरे बुद्ध्वा मद्यमत्ता इति स्त्रियः ॥ ३२ ॥ उवाच नारदः साम्बं सुबोध्य त्वरयन्निदम् । गच्छ रैवतकं साम्ब मा तिष्ठस्व कुमारक ॥ ३३ ॥ त्वां समाह्वयते देवो न युक्तं स्थातुमत्र ते ।

साथ ही आम्र का भग्न वृन्त तथा नीलोत्पल भी दिया जा रहा था। इस अवसर पर नारद ने यह देखा कि रमणीगण मद्य पीकर उन्मत्त हैं। अब नारद तीव्र वेग से साम्ब के पास जाकर बोले—हे साम्ब! रैवतक उद्यान में जाओ। उपेक्षा न करो। तुमको वासुदेव ने बुलाया है। अतः तुम्हारा यहाँ रुकना उचित नहीं है॥३३-३४॥

तद्वाक्यार्थमबुद्ध्वैव भाविनाथेन चोदितः ॥ ३४ ॥ गत्वा तु सत्वरं साम्बः प्रणाममकरोत् पितुः । एतस्मिन्नन्तरे तत्र याः काश्चित्तुल्यसात्त्विकाः ॥ ३५ ॥ दृष्ट्वा ताः सहसा साम्बं सर्वाश्चक्षुभिरे स्त्रियः । न च दृष्टः पुरा याभिः पुष्पकेतुसमो युवा ॥ ३६ ॥

उनके वाक्य का निहित अर्थ समझे बिना दैवप्रेरित साम्ब शीघ्रता से वहाँ गये और श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। इस बीच वहाँ जितनी भी तुल्यसात्विक रमणीगण थीं, जिन्होंने