साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९८ श्रीसाम्बपुराणम्
यथावत् आनुपूर्वीक चार वर्ण की शब्दपरीक्षा करके माङ्गल्यवाचक प्रशस्त वचन ग्रहणीय है तथा अप्रशस्त वर्जनीय है। घृत तथा मधु से लिप्त अतुफल (जिसके फल से दलबद्ध पतङ्गसमूह आविर्भूत होते हैं, ऐसे गूलर के फल) से आहुति प्रदान करनी चाहिये॥७-८॥
ततः सूत्रान्यसेन् मन्त्री यथावदनुपूर्वशः।
सिन्दूरिकानसुचनग्रन्थिस्त्येन विवर्जितान्॥९॥
कार्पासिकान् बल्कल्यान्क्षौमान् कौशिकपट्टकान्।
यथाहस्तविभागेन पातयन्मन्त्रवत्समम्॥१०॥
ऐन्द्रे च प्रथमं सूत्रं हृदयेनाभिमन्त्रितम्।
ततश्चाष्टदले पद्ममध्ये तस्य नियोजयेत्॥११॥
तदनन्तर मन्त्री यथावत् आनुपूर्वीक सूत्र का विन्यास करे। सिन्दूर वर्ण के तथा सिले वस्त्र का वर्जन करके कपास का वस्त्र, वल्कलवस्त्र, सिल्क या कौशिकवस्त्र—इनमें से किसी एक का एक हाथ वस्त्र मन्त्रज्ञ साधक पूर्व की ओर प्रथम सूत्र को हृदय द्वारा अभिमन्त्रित करे। तदनन्तर अष्टदल पद्म से उसे युक्त करे॥९-११॥
गायत्र्या लब्धहस्तं तु चिन्तयित्वा दिवाकरम्।
याति चित्तरजाः प्राज्ञो जपेच्चैव षडक्षरम्॥१२॥
सत्वं रजस्तमश्चेति हितं राजसलक्षणम्।
अङ्गुष्ठपर्वविपुलं रजः सर्वत्र कथ्यते॥१३॥
अतिक्षीणं तथा स्थूलं कृशं बिन्दुविवर्जितम्।
आलिखेन्मण्डलं दिव्यं चतुर्द्वारं सुशोभनम्॥१४॥
गायत्री द्वारा अपने हस्त में प्राप्त दिव्य हाथ का चिन्तन करे। चित्त का मालिन्य हट जाने पर प्राज्ञ व्यक्ति (षडक्षर) सूर्यमन्त्र का जप करे। सत्व-रज तथा तम हैं—राजस चिह्न। अंगुष्ठपर्व के बराबर स्थूल रजःगुण सर्वत्र रहता है। अति तीक्ष्ण, स्थूल, कृशबिन्दु, चतुर्द्वारयुक्त सुशोभन दिव्य मण्डल अंकित करे॥१२-१४॥
आयुधानि तथा चाष्टौ दिशासु विदिशासु च।
पूर्वपत्रे तथोङ्कारे पश्चिमे तु खकारकम्॥१५॥
खोकारं दक्षिणे पत्रे ल्काकारं चोत्तरे तथा।
यकारः वायुभागे तु स्वाकारं वह्निसंस्थितम्॥१६॥
हकारं नैऋते योज्यं क्षेमेशान्यां तथा दिशि।
कर्णिकायां तथा देवं महातेजो द्विरक्षरम्॥१७॥
इस प्रकार दिक् तथा विदिक् में आठ आयुध अंकित करे। पूर्वपत्र में ओंकार, पश्चिम में 'ख'कार, दक्षिण में 'खो'कार तथा उत्तर में 'ल्का'कार अंकित करे। इसी प्रकार