साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः २३
स ह्यन्तरात्मा भूतानां क्षेत्रज्ञश्चैव कथ्यते।
त्रिगुणव्यतिरिक्तोऽसौ पुरुषश्चेति विश्रुतः ॥१५॥
जो सूक्ष्म, अविज्ञेय, अव्यक्त (अप्रकाश), अचल, ध्रुव (नित्य) हैं; इन्द्रिय, इन्द्रियार्थ तथा सभी प्राणियों से जो बहिर्भूत हैं, सभी प्राणीगण की अन्तरात्मा तथा क्षेत्रज्ञ हैं। वे त्रिगुणातिरिक्त पुरुषरूपेण विश्रुत हैं॥१४-१५॥
हिरण्यगर्भो भगवान् स वै बुद्धिरिति स्मृतः।
धृतेनैकात्मना येन त्रैलोक्यमिदमात्मना ॥१६॥
वे हिरण्यगर्भ भगवान् जो बुद्धिस्वरूप कहे जाते हैं, जो अपने एक रूप से त्रिलोक को धारण करते हैं॥१६॥
अशरीरः शरीरेषु सर्वेषु निवसत्यसौ।
वसन्नपि शरीरेषु न स लिप्यति कर्मभिः ॥१७॥
सभी देव-देवियों के शरीर में वे अशरीरी रूपेण निवास करते हैं। सभी शरीर में वास करने पर भी वे कर्मों से लिप्त नहीं होते॥१७॥
ममान्तरात्मा तव च ये चान्ये देहसंज्ञिताः।
सर्वेषां साक्षिभूतोऽसौ न ग्राह्यः केनचित्क्वचित् ॥१८॥
सगुणो निर्गुणो विश्वो ज्ञानगम्यो ह्यसौ स्मृतः ॥१९॥
वे हम सबकी अन्तरात्मा हैं तथा सभी देहधारियों के साक्षी-स्वरूप हैं। वे कभी भी किसी के द्वारा ग्रहण करने योग्य नहीं हैं। वे सगुण-निर्गुण विश्वरूप तथा ज्ञानगम्य कहे जाते हैं॥१८-१९॥
सर्वतः पाणिपादोऽसौ सर्वतोऽक्षिशिरोमुखः।
सर्वतः श्रुतिमांल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥२०॥
वे सर्वतः पाणि-पादयुक्त, चक्षु, मस्तक तथा मुखयुक्त हैं। वे सर्वतः (सबके) कर्ण हैं तथा समस्त लोक के सब कुछ को घेर कर अवस्थित हैं॥२०॥
सर्वेन्द्रियगुणावासः सर्वेन्द्रियमथो ह्यसौ।
यथा दीपसहस्राणि स च एकः प्रसूयते ॥२१॥
बुध्यते स यदात्मानं तदा भवति केवलः।
एकत्वं प्रलये चास्य बहुत्वं च प्रवर्त्तनात् ॥२२॥
नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावरजङ्गमम्।
ऋते तमेकमीशानं भूतं स्थावरजङ्गमम् ॥२३॥