भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 424 में से

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त्रिसप्ततितमोऽध्यायः

(बीजप्रसवः)

आद्यन्तं प्रणवं ज्ञेयं योनिबीजं पुनः पुनः।
न्यसेत् पञ्चाक्षरं भूमौ फलार्थी परमेष्ठिनम् ॥१॥
न्यसेदष्टाक्षरं तस्य बीजमादौ सबिन्दुकम्।
शेषाः स्युः प्रणवाद्यन्ताः परस्यां दिशि कारणम् ॥२॥

आदि तथा अन्त में प्रणव को जाने, बारम्बार योनिबीज का विन्यास करे। फलार्थी भूमि में परमेष्ठी रूप पञ्चाक्षर का विन्यास करे। अष्टाक्षर विन्यास करे। उसका बीज आदि में बिन्दुयुक्त होगा। शेष के आदि तथा अन्त में प्रणवयुक्त रहेगा। यह है—पश्चिम का कारण॥१-२॥

दक्षिणस्यां परो देवः परस्यां स्यात् सबिन्दुकः ।
ईशान्यादौ सबिन्दुः स्यात्तदन्यानि तु पूर्ववत् ॥३॥
न चाक्षरः परस्यां स्यात् सबिन्दूकारपूर्वकः ।
अष्टौ क्रिया यदन्यानि भूतात्मा नामतस्तु सः ॥४॥

दक्षिण दिशा में परमदेवता हैं। यह बिन्दुयुक्त होंगे। इनके आदि में बिन्दु होगा, अन्य पूर्ववत् होगा। परयोनि में बिन्दु तथा उकारयुक्त कोई अक्षर नहीं होगा। अन्य जो आठ क्रिया है, वह भूतात्मा है॥३-४॥

व्योमाद्यन्तं परो देवो विरामे प्रणवस्ततः ।
अक्षराणि च विज्ञेया बीजयोनिस्तु यादृशी ॥५॥

व्योमाद्यन्त परमदेवता है। तदनन्तर विराम में प्रणव है। जैसा योनिबीज होगा, वैसे ही अक्षर होंगे॥५॥

सुप्रणवादि च भवेद् व्यापिने मध्यतो भवेत् ।
प्रासूत्याख्यो यदा देवः वर्णा दश च सप्त च ॥६॥

आदि में प्रणव होगा। व्याप्ति होने पर मध्य में होगा। प्रसूति नामक देवता १० तथा ७ (अर्थात् १७) वर्णयुक्त होगा॥६॥

ओंकारावभितो यस्य व्योममध्ये ततः परः।
विन्यस्य सृष्टिसंज्ञोऽथ देवः पञ्चदशाक्षरः ॥७॥

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