साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८ श्रीसाम्बपुराणम्
ये जगत् की सृष्टि-स्थिति-विनाश करने में सक्षम हैं, शक् धातु का अर्थ है—समर्थ; अतः इन्हें शक्र कहा गया है॥३२॥
वसत्यदृष्टः सर्वेषु भूतेष्वन्तर्हितो रविः।
धातुर्वस निवासेति विवस्वांस्तेन तूच्यते ॥३३॥
रवि सभी प्राणियों के अभ्यन्तर में अदृश्य तथा अन्तर्हित होकर वास करते हैं। 'वस' धातु का अर्थ है—निवास। इसलिये इनका नाम विवस्वान् कहा गया है॥३३॥
गर्जशब्दे प्रपूर्वस्य धातोः पर्जन्निपातके।
गर्जत्यतीव यस्माच्च तस्मात् पर्जन्य उच्यते ॥३४॥
प्रपूर्वक गर्ज धातु के निपात से पर्जन शब्द निष्पन्न होता है, क्योंकि वे अत्यन्त गर्जन करते हैं, इसलिये इन्हें पर्जन्य नाम से कहा गया है॥३४॥
यस्मात् सिञ्चति लोकांस्त्रीन् भूर्भुवःस्वोऽमृतादिभिः।
पुष पुष्टौ स्मृतो धातुस्तस्मात् पूषा स उच्यते ॥३५॥
अमृतादि द्वारा भू-भुवः तथा स्वः—इन लोकत्रय का सिञ्चन (पोषण) करते हैं। पुष धातु का अर्थ है—पुष्टि (पोषण करना); इस कारण उनको पूषा कहते हैं॥३५॥
अंशु व्याप्तावयं धातुः प्रियश्चापानुरागतः।
सूर्यो व्याप्तं जगद् यस्मात्तस्मादंशुः स उच्यते ॥३६॥
अंशु धातु का अर्थ है—व्याप्ति एवं प्रीति तथा अनुरागवशात् सूर्य समस्त जगत् को व्याप्त करते हैं; अतः उनको अंशु कहा जाता है॥३६॥
सेव्यते यः सुरैः सर्वैः भांश्चैव भजते यतः।
धातुर्भजेति सेवायां तेनासौ भग उच्यते ॥३७॥
सकल देवगण के द्वारा जो सेवित होते हैं, क्योंकि ये किरणसमूह का भजन करते हैं। भज धातु का अर्थ है—सेवा; अतः यह सूर्य भग नाम से उक्त हैं॥३७॥
तुष तुष्टौ स्मृतो धातुस्तस्मात् त्वष्टा निपात्यते।
सृजत्येष प्रजास्तुष्टस्त्वष्टा तेन स उच्यते ॥३८॥
तुष धातु का अर्थ तुष्टि है। उससे त्वष्टा शब्द का निपातन होता है। ये तुष्ट होकर प्रजागण की सृष्टि करते हैं; अतः इन्हें त्वष्टा कहा गया है॥३८॥
यस्माद्विश्वमिदं सर्वमादित्येनेह रश्मिभिः।
विष्ऌ व्याप्तौ स्मृतो धातुस्तस्माद्विष्णुः स उच्यते ॥३९॥
आदित्य अपनी रश्मि द्वारा इस समस्त विश्व को व्याप्त करते हैं; विष्ऌ धातु का व्याप्ति अर्थ है, तभी वे विष्णु हैं॥३९॥