भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

एकादशोऽध्यायः ५९

नारद उवाच

आदित्यस्त्वब्रवीत् छायां किमर्थं तनयेषु वै।
तुल्येष्वभ्यधिकः स्नेह एकत्र क्रियते त्वया ॥३१॥
सा परिहरन्त्यस्मै नाचचक्षे विवस्वतः।
आत्मानं स समाधाय युक्तस्तथ्यमपश्यतः ॥३२॥
तां शप्तुकामो भगवान् नाशाय कुपितः प्रभुः।
ततः छाया यथावृत्तमाचचक्षे विवस्वतः ॥३३॥

नारद कहते हैं—तत्पश्चात् आदित्य भगवान् ने छाया से पूछा कि तुम बराबर के पुत्रों में से एक में अधिक स्नेह करती हो? युक्तियुक्त कोई मार्ग न देखकर स्वयं को संयत करके छाया ने परिहार करने की इच्छा से सूर्य को कोई उत्तर नहीं दिया। इससे क्रुद्ध होकर प्रभु सूर्यदेव छाया के विनाश के लिये शाप देने हेतु कुपित हो गये। तदनन्तर छाया ने सूर्य को सब वृत्तान्त बतलाया॥३१-३३॥

विवस्वांस्तु ततः श्रुत्वा क्रुद्धः श्वशुरमभ्यगात्।
स चापि तं यथान्यायमर्चयित्वा तु रोपितम् ॥३४॥
निर्दग्धुकामं रोषेण सान्त्वयामास तं शनैः ॥३५॥

विवस्वान् छाया के वचन सुनकर क्रोधित हो अपने श्वसुर के पास गये। उन्होंने (विश्वकर्मा ने) भी उनकी यथायोग्य संवर्धना करके उनके कोप से दग्धकाम चित्त को धीरे-धीरे सान्त्वना प्रदान किया॥३४-३५॥

विश्वकर्मोवाच

तवातितेजसाविष्टमिदं रूपं सुदुःसहम्।
असहन्ती तु सा संज्ञा वने वसति शाद्वले ॥३६॥
द्रक्ष्यसे तां भवानद्य स्वां भार्यां शुभचारिणीम्।
रूपार्थं भवतोऽरण्ये चरन्तीं सुमहत्तपः ॥३७॥

तुम्हारा यह तेजोरूप अत्यन्त दुःसह है। वह संज्ञा उसे सहन न कर पाने से तृणाच्छादित वन में तप कर रही है। आज तुम अपनी मंगलचारिणी भार्या को देख सकोगे। तुम्हारे इस तेजोरूप के कारण वह अरण्य में महान् तप कर रही है॥३६-३७॥

मतं मे ब्रह्मणो वाक्यं यदि ते देव! रोचते।
रूपं निवर्त्तयाम्यद्य तव कान्तमरिन्दम ॥३८॥
रूपं विवस्वतश्चासीत्तिर्यगूर्ध्वमधः समम्।
तेनापि पीड़ितो देवो रूपेण ते दिवस्पतिः ॥३९॥