भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

अष्टादशोऽध्यायः

(देवताख्यापनम्)

नारद उवाच

अतो व्योमं प्रवक्ष्यामि यत्रोत्पन्नं यथा च यत्।
अण्डैः हिरण्यगर्भस्य यदल्पं गर्भसंज्ञितम् ॥१॥
तत्रोत्पन्नमिदं व्योम कपाले द्योमहीमये।
अथोल्बणः काञ्चनमयश्चतुरस्रोऽङ्घ्रितो महान् ॥२॥
उत्पन्नः स चतुःशृङ्गो मेरुर्देवतसंश्रयः।
दिक्पद्मपत्रा पृथिवी मेरुस्तस्याश्च कर्णिका ॥३॥

नारद कहते हैं—अब व्योम (आकाश) की कथा कहूँगा। इसकी उत्पत्ति जहाँ से जिस प्रकार से होती है, अब उसे कहूँगा। हिरण्यगर्भ के अण्डसमूह द्वारा अथवा अल्प गर्भ नामक स्थान से यह व्योम उत्पन्न हुआ है। स्वर्ग तथा पृथ्वी इसके दो हिस्से हैं (जैसे घड़े के दो हिस्से (कपाल) होते हैं, उसी प्रकार)। तदनन्तर अति उज्ज्वल स्वर्णमय महान् चतुरस्र चरणों से उत्पन्न हुआ। यह है—चार शृङ्गयुक्त मेरु अथवा देवगण का आश्रयस्थल। इसकी सभी दिशायें पद्मपत्रतुल्य हैं, पृथिवी तथा मेरु उसकी कर्णिका हैं॥१-३॥

युगाक्षकोटिविन्यस्तं तत्र कृत्वा रथं रविः।
सर्वैर्देवैः परिवृतस्तस्य याति प्रदक्षिणम् ॥४॥

वहाँ रवि युगाक्षकोटि विन्यस्त रथ का निर्माण करके देवगण के साथ परिवृत होकर उस पर्वत की प्रदक्षिणा करते हैं॥४॥

तस्मिन् मेरौ त्रयस्त्रिंशद् वसन्ते याज्ञिकाः सुराः।
रुद्रा एकादश ज्ञेया आदित्या द्वादशैव तु ॥५॥
तथैव वसवो ह्यष्टावश्विनौ चैव याज्ञिकौ।
वसून् वदन्ति हि पितॄन् रुद्रस्त्वेव पितामहान् ॥६॥
प्रपितामहाश्च आदित्यानाश्विनावात्मनस्तनुम्।
पितॄन् भूयः प्रवक्ष्यामि ऋतुसंवत्सरार्तवान् ॥७॥

उस मेरु पर ३३ याज्ञिक देवता वास करते हैं। ११ रुद्र, १२ आदित्य, आठ वसु एवं अश्विनीकुमारद्वय वहाँ यज्ञिक हैं। सब मिलाकर ३३ होते हैं पितृपुरुष। रुद्रगण के पितामह हैं, आदित्य गण के प्रपितामह हैं तथा अश्विनीकुमारद्वय को निज-तनु कहा गया है। अब पितृगण, ऋतु, संवत्सर तथा ऋतुजात द्रव्यादि का प्रसङ्ग कहा जायेगा॥५-७॥