सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र
Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras
आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहितैषी जन छोड़कर चले जाते हैं, परंतु पुनः धन आने पर फिर से उसी का आश्रय लेते हैं॥5॥ इसका भाव यह है कि आदमी के जीवन में धन का बड़ा महत्त्व है। धन ही भाई है, धन ही मित्र है और धन ही स्त्री है। अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दशवर्षाणि तिष्ठति। प्राप्ते चैकादशे वर्षे समूलं तद् विनश्यति॥ अन्याय से उपार्जित किया गया धन दस वर्ष तक रहता है। ग्यारहवें वर्ष के आते ही जड़ सहित नष्ट हो जाता है॥6॥ अन्यायपूर्वक धन कमाने के लिए व्यक्ति को कभी प्रयास नहीं करना चाहिए। अयुक्तं स्वामिनो युक्तं युक्तं नीचस्य दूषणम्। अमृतं राहवे मृत्युर्विषं शंकर भूषणम्॥ समर्थ व्यक्ति द्वारा किया गया गलत कार्य भी अच्छा कहलाता है और नीच व्यक्ति के द्वारा किया गया अच्छा कार्य भी गलत कहलाता है। ठीक वैसे, जैसे अमरता प्रदान करने वाला अमृत राहु के लिए मृत्यु का कारण बना और प्राणघातक विष भी शंकर के लिए भूषण हो गया॥7॥ भाव यह है कि समर्थ व्यक्ति को दोष नहीं दिया जा सकता। तुलसीदासजी ने भी कहा है—'समरथ को नाहिं दोष गुसाईं।' तद् भोजनं यद् द्विजभुक्तशेषं, तत्सौहृदं यत् क्रियते परस्मिन्। स प्राज्ञता या न करोति पापं, दम्भं विना यः क्रियते स धर्मः॥ भोजन वही है जो ब्राह्मण के करने के बाद बचा रहता है, भलाई वही है जो दूसरों के लिए की जाती है, बुद्धिमान वही है जो पाप नहीं करता और बिना पाखण्ड तथा दिखावे के जो कार्य किया जाता है, वह धर्म है॥8॥ 156 CC0 Vashishtha Tripathi Collection. Digitized by eGangotri