भारतकोश
सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

सम्पूर्ण चाणक्य नीति एवं राजनीति सूत्र

Sampurna Chanakya Niti & Rajaniti Sutras

आचार्य चाणक्य (विष्णुगुप्त / कौटिल्य) द्वारा

DevanagariHindipublished196 पृष्ठ

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व्यर्थ है और मच्छरों को काटने से भी नहीं रोक पाती, उसी प्रकार बिना विद्या के मनुष्य जीवन व्यर्थ है।। 19।। जिस प्रकार कुत्ते की पूंछ से न तो उसके गुप्त अंग छिपते हैं और न वह मच्छरों को काटने से रोक सकती है, उसी प्रकार विद्या-विहीन पुरुष मूर्खता के कारण अपनी रक्षा करने में असमर्थ होता है। वह अपना भरण-पोषण भी ठीक से नहीं कर पाता। वाचः शौचं च मनसः शौचमिन्द्रयनिग्रहः। सर्वभूते दया शौचं एतच्छौचं पराऽर्थिनाम्॥ बोलचाल अथवा वाणी में पवित्रता, मन की स्वच्छता और यहां तक कि इन्द्रियों को वश में रखकर पवित्र रहने का भी कोई महत्त्व नहीं, जब तक कि मनुष्य के मन में जीवनमात्र के लिए दया की भावना उत्पन्न नहीं होती। सच्चाई यह है कि परोपकार ही सच्ची पवित्रता है। बिना परोपकार की भावना के मन, वाणी और इन्द्रियां पवित्र नहीं हो सकतीं। व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने मन में दया और परोपकार की भावना को बढ़ाए॥20॥ आचार्य चाणक्य ने उपरोक्त श्लोक के द्वारा अनेक पवित्रताओं की बात की है। ब्रह्मचर्य, तप, क्षमा, शराब और मांस का त्याग, मर्यादा के भीतर रहना और मन को वश में करना, ये सारी बातें शौच पवित्रता के लक्षण हैं। पुष्पे गंध तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्। इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽऽत्मानं विवेकतः॥ जिस प्रकार फूल में गंध, तिलों में तेल, लकड़ी में आग, दूध में घी, गन्ने में मिठास आदि दिखाई न देने पर भी विद्यमान रहते 92 CC0. Vasistha Tripathi Collection Digitized by eGangotri