सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी सांख्य दर्शन ( ७ ) त्त ( दूसरे में रहने वाला )। लिङ्ग (दूसरे का अनुमान कराने वाला )। सावयव ( अवयवों या भागों वाला ) और परतन्त्र ( पराधीन ) । अव्यक्त या मूल-प्रकृति उससे विपरीत होती है। अर्थात्- कारणशून्य (उसका कोई कारण नहीं), नित्य, व्यापक, नि- ष्क्रिय, एक, अनाश्रित ( किसी आधार में नहीं रहने वाली ) अलिङ्ग (किसी वस्तु का अनुमान न कराने वाली), निरवयव (उस में कोई अवयव या भाग नहीं हैं) और स्वतन्त्र या स्वाधीन है। व्यक्त अव्यक्त दोनों का साधर्म्य( समानधर्मता ) और उन से पुरुष का वैधर्म्य ( विरुद्ध धर्मता ) । त्रिगुणमविवेकि विषयः सामान्यमचेतनं प्रसवधर्मि। व्यक्तं तथा प्रधानं तद्विपरीतस्तथाच पुमान् ॥११॥ (क) व्यक्त और अव्यक्त दोनों ही त्रिगुण, अविवेकी, विषय, सामान्य, अचेतन और प्रसवधर्मी हैं। (ख) और पुरुष उन दोनों ( व्यक्त और अव्यक्त ) से विलक्षण अर्थात्-अत्रिगुण, विवेकी, अविषय, असामान्य, चेतन और अप्रसवधर्मी है। तथा नित्यत्व, स्वतन्त्रत्व, कारणशून्य- त्व, व्यापकत्व, निष्क्रियत्व, अनाश्रितत्व, अलिङ्गत्व, और निरवयवत्व, - इन विशेषणों से प्रकृति के सदृश और अनेकता से व्यक्त (महत् आदि) के सदृश है॥ ११॥ तीन गुण और उन के लक्षण प्रीत्यप्रीतिविषादात्मकाः प्रकाशप्रवृत्तिनियमार्थाः। अन्योन्याभिभवाश्रयजननमिथुनवृत्तयश्चगुणाः १२।