सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १३ ) हिन्दी सांख्य दर्शन व्यक्त (शरीर आदि) और अव्यक्त (मूल प्रकृति) से भिन्न पुरुष है। क्योंकि— (क) जो २ वस्तु संघात रूप है, अर्थात् अनेक वस्तुओं से मिल कर बनी है, जैसे शय्या आसन आदि, वह सब दूसरे के अर्थ देखी जाती है, ऐसे ही ये महत् तत्त्व और शरीर आदि हैं, इस लिये ये पर के अर्थ हैं। जो पर वस्तु है, वही आत्मा ( पुरुष ) है। संघात दूसरे संघात के लिये नहीं। ऐसा प्रश्न हो सकता है कि-एक संघात रूप वस्तु दूसरे संघात के लिये मान ली जावे, तो अन्य पुरुष वस्तु की कल्पना न करना पड़े ? इस का उत्तर यह है कि-यदि एक संघात दूसरे संघात के लिये माना जावेगा, तो वह भी संघात है, उस की परार्थता के लिये तीसरा संघात मानना होगा, एवम् उस की परार्थता के अर्थ ४था संघात कल्पित करना होगा। सुतराम् संघात को दूसरे संघात की अपेक्षा रहने से उसकी संख्या पूरी न होगी। इसे अनवस्था दोष कहते हैं। इसी के कारण उक्त प्रश्न नहीं उठ सकता, अतः संघात असंघात रूप पुरुष के अर्थ ही मानने से सुगति होती है। दूसरा हेतु यह है कि जो २ त्रिगुण रथ आदि संघात हैं, वे सब दूसरे से अधिष्ठित या दूसरे के वश में रहते हुये देखे जाते हैं, अतः उन के समान त्रिगुण महत्तत्त्व और शरीर आदि के लिये भी दूसरे अधिष्ठाता की अपेक्षा होती है एवम् अधिष्ठित के अधिष्ठाता के रूप में पुरुष सिद्ध होता है। तीसरा हेतु यह है कि-जो २ त्रिगुण संघात शय्या आसन आदि हैं, वे सब भोग्य वस्तु हैं, अतः उन्हें अपनैं से विलक्षण (अत्रिगुण) भोक्ता की अपेक्षा रहती है। एवम् उन भोग्य वस्तुओं के भोक्तारूप से पुरुष की सिद्धि होती है।