भारतकोश
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

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हिन्दी सांख्य दर्शन (१७) पुरुष और लिङ्ग के संयोग का कारण । पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य । पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतःसर्गः ॥२१॥ पहिली कारिका के व्याख्यान में यह बात समझी गई कि- पुरुष और प्रधान या लिङ्ग के संयोग से उनमें परस्पर के कर्त्तृत्व और चेतनत्व धर्म भ्रान्ति से प्रतीत होते हैं। किन्तु अभी यह बात समझ में नहीं आई, कि- इनका संयोग ही पहिले कैसे हुआ ? इस प्रश्न के उत्तरके लिये ही यह कारिका आई है। इसमें कहा गया है कि- भोक्ता और भोग्य की योग्यता से ही इन दोनों का किसी अनादि काल में संयोग होगया था, और उनके संयोग से ही यह महत् आदि तत्वों या संसार की सृष्टि हुई। अर्थात्-जैसे-किसी भूखे आदमी को कोई फल मोदक आदि भक्ष्य वस्तु मिले और वह उसे खाने लगे । इस बात को ध्यान में देने से प्रतीत होगा कि-आदमी में भोजन करने की योग्यता है और फल आदि में भोग्यता की, वृक्षों से उस के संयोग होते ही भोजन रूप क्रिया की सृष्टि होने लगती है यदि उनका संयोग न हो अथवा भोक्ता का भोक्ता के साथ तथा भोग्य का भोग्यके साथ संयोग हो भी जावे तो उनकी योग्यता वहां सृष्टि को प्रवृत्त नहीं कर सकती, बल कि- वह व्यर्थ ही रहेगी। ऐसे ही पुरुष की भोक्तृत्व योग्यता और प्रधान की भोग्यत्व योग्यता से उनका कभी संयोग हुआ,और उसी से सृष्टिका आरम्भ हुआ ऐसे ही कारिका में पंगु और अन्ध का दृष्टान्त भी है। इस की व्याख्या यों है कि- जैसे कोई पंगु और अन्ध दो मनुष्य हैं, और वे दोनों ही अपने संघ के साथ बनमें जाते हुये डाकुओंके उपद्रव से अपने साथियों से अलग होगये, तथा वनमें कहीं २