भारतकोश
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

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( १० ) हिन्दी सांख्य दर्शन पांच तन्मात्र ( कुल १६ ) ॥ २४ ॥ एक अहंकार से जड़ और प्रकाश की उत्पत्ति सात्विक एकादशकः प्रवर्त्ततेवैकृतादहंकारात् । भूतादेस्तन्मात्रः स तामसः, तैजसादुभयम् ॥२५॥ अहंकार में तीन गुण होते हैं-सत्व, रज, और तम । जब इन में सत्व गुण से रज और तम दब जाते हैं, उस समय अहंकार की वैकृत संज्ञा (नाम) होती है । उस वैकृत अहंकार से सत्वगुण की सहायता से ग्यारह इन्द्रियें उत्पन्न होती हैं । इसी से ये इन्द्रियें सात्विक कही जाती हैं। जिस समय तमोगुण से सत्व और रज तिरस्कृत हो जाते हैं, उस समय जो अहंकार है, उस की भूतादि संज्ञा और तमो- गुण के आधिक्य से 'तामस' संज्ञा भी हो जाती है, उस भूतादि या तामस नाम अहंकार से उस के समान स्वभाव वाले शब्द आदि ५ तन्मात्र उत्पन्न होते हैं । एवम्-जब रजो गुण से सत्व और तम दब जाते हैं, या जित हो जाते हैं, उस समय उस की तैजस संज्ञा हो जाती है । उस तैजस अहंकार से दोनों ( इन्द्रियें और तन्मात्र ) उत्पन्न होते हैं । क्योंकि-वैकृत अहंकार विकृत हो कर जब ११ इन्द्रियों को उत्पन्न करना चाहता है, तो वह निष्क्रिय होने के कारण अपने कार्य को कर नहीं सकता, अतः वह तैजस अहंकार जो क्रिया स्वभाव है, उस की सहायता लेता है, तथा तामस अहंकार भी निष्क्रिय होने से तन्मात्र रूप अपने कार्य को नहीं कर सकता अतः उसे भी तैजस अहंकार की सहायता लेनी पड़ती है । इस प्रकार वैकृत और भूतादि दोनों अहं- कारों के साथ उनके कार्य में सहायक होने के कारण यह दोनों प्रकार के कार्यों का कारण बनता है ॥ २५ ॥