भारतकोश
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

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हिन्दी सांख्य दर्शन ( २५ ) आभ्यन्तर इन्द्रियों के द्वारा होने वाला ज्ञान बाह्यविषय में स्मरणरूप और आभ्यन्तर सुख दुःख आदि विषय में प्रत्यक्ष रूप होता है ॥ ३० ॥ इन्द्रियों तथा तीनों अन्तःकरणों की परिचालना । यद्यपि इन्द्रियों की प्रवृत्ति का क्रम समझा गया, तथापि यह नहीं जाना गया कि-इनका प्रेरक कौन है या किस से ये परिचालित होती हैं? इसी के उत्तर में यह कारिका है— स्वां स्वां प्रतिपद्यन्ते परस्पराकूतहेतुकां वृत्तिम् । पुरुषार्थ एव हेतु र्न केनचित् कार्यते करणम् ॥ ३१ ॥ जिस प्रकार अनेक चोर आपस में संकेत करके चोरी के स्थान में परस्पर के संकेत वश अपनी२ क्रियाओं को यथाक्रम करते हैं, उसी प्रकार सब इन्द्रियें भी अपनी२ वृत्तियों (क्रिया ओं ) में प्रवृत्त होती हैं, इनकी प्रवृत्तियों में पुरुषार्थ ( पुरुष का अदृष्ट ) ही कारण है । सुतराम् इन्द्रियें किसी चेतन अधि ष्ठाता से परिचालित नहीं होतीं ॥ ३१ ॥ करण के भेद । करणंत्रयोदशविधम्, तदाहरणधारणप्रकाशकरम् । कार्यं च तस्य दशधाऽऽहार्यं धार्यं प्रकाश्यं च ॥३२ करण १३ प्रकार का होता है ( ११ इन्द्रियें १ बुद्धि १ अहंकार ) । उनमें— १-कर्मेन्द्रियों ( वाणी आदिकों ) का आहरण ( लाना ) कर्म है । २-अन्तःकरणों ( बुद्धि अहंकार और मन ) का प्राणादिका अपनी वृत्तियों से धारण करना कर्म है । ३-ज्ञानेन्द्रियों का प्रकाश करना कर्म है ।