भारतकोश
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

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( ३० ) हिन्दीसांख्यदर्शन ( प्रधान ) है । इनके मत में सब ज्ञान बुद्धि में ही रहता है, आत्मा या पुरुष में उसकी छायामात्र पड़ती है और साक्षात् सम्बन्ध का ज्ञान भ्रान्ति रूप है । अतः बुद्धि ही प्रधान है ३६ फिर बुद्धि की प्रधानता । सर्वं प्रत्युपभोगं यस्मात् पुरुषस्य साधयति बुद्धिः । सैव च विशिनष्टि पुनः प्रधानपुरुषान्तरं सूक्ष्मम्३७ जिस कारण से कि-पुरुष के सब विषय के उपभोग को बुद्धि साधन करती है, और वही फिर प्रधान और पुरुष के सूक्ष्म (दुर्लक्ष्य) अन्तर को प्रकाशित करती है, अतः वही (बुद्धि) प्रधान है। जिस प्रकार कि-सर्वाध्यक्ष या प्रधान मन्त्री राजा के सब कार्यों का साक्षात् सम्पादन करने से प्रधान है, और ग्रामाध्यक्ष आदि उसके प्रति गौण रहते हैं। अर्थात्- बुद्धि पुरुष के साक्षात् सम्बन्ध से या ठीक उसी के साथ संयुक्त होने से पुरुष की छाया ( छवि ) को धारण कर लेती है, जो २ कुछ सुख, दुःख आदि बुद्धिमें होता है वही पुरुषमें दिखाई देता है, और सब पुरुष से दूर रहते हैं, जैसे अहंकार और पुरुष के बीच में बुद्धि पड़ जाती है, तथा और इन्द्रियों के बीच में अहंकार और बुद्धि पड़ती है । इसी से उनपर पुरुष की और पुरुष पर उनकी छाया नहीं पड़ती । सुतराम् उक्त प्रकार बुद्धि ही पुरुष के सब उपभोगों का साक्षात् साधन है, और वही प्रधान ॥ ३७ ॥ विशेष अविशेषों का विभाग । तन्मात्राण्यविशेषाः, तेभ्यो भूतानि पञ्चपञ्चभ्यः एतेस्मृता विशेषाः, शान्ता घोराश्चमूढाश्च ॥३८॥ शब्द आदि ५ तन्मात्र अविशेष कहलाते हैं, और उन

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