सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी सांख्य दर्शन ( ४१) संभावना है, अतः उसकी रक्षा में महादुःख है, ऐसी भावना वाले को जो विषय से उपरम में तुष्टि है, वह दूसरी 'सुपार' 'तुष्टि है। (ग) [क्षय] ऐसे ही बड़े परिश्रम से इकट्ठा किया हुआ धन भोग करने से क्षीण होजाता है, इस प्रकार उसके क्षय हो जाने की भावना करने वाले को जो विषय के उपरम में तुष्टि होती है, वह तीसरी 'पारापार' कहलाती है। (घ) इसी प्रकार शब्द आदि विषयों के भोगाभ्यास से काम (मनोरथ) बढ़ते हैं, और वे विषय की प्राप्ति न होने पर कामी पुरुषको दुःखित करते हैं इससे भोग दोषको जानने वालेको जो विषयसे उपरम में तुष्टि होती है, वह चौथी 'अनु- त्तमाम्भ' कहलाती है। (ङ) ऐसे ही दसरे प्राणियों की हानि किये बिना या सताये बिना विषयों का उपभोग नहीं हो सकता, इस हिंसा दोष को देख कर जो विषय से उपरम में तुष्टि होती है, वह ५ वीं 'उत्तमाम्भ' कहलाती है। ऐसे चार आध्यात्मिकौ और ५ बाह्य तुष्टियों को मिलाकर ६ तुष्टियें होती हैं ॥ ५० ॥ गौण और मुख्य सिद्धियें ॥ ऊहः शब्दोऽध्ययनं दुःखविघातास्त्रयः सुहृत्प्राप्तिः । दानंचसिद्धयोऽष्टौसिद्धेपूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविधः ॥५१॥ तीन दुःखों के नाश तीन मुख्य सिद्धियें हैं। और सब (१) अध्ययन (२) शब्द (३) ऊह (४) सुहृत्प्राप्ति और (५) दान ये ५ सिद्धियें गौण हैं। सिद्धिके पूर्व जो विपर्यय अशक्ति और तुष्टि के भेद से तीन प्रकार की बुद्धि की सृष्टि (का० ४६ में) देखी गई है,