भारतकोश
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

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हिन्दीसांख्यदर्शन ( ४६ ) सांख्य शास्त्र के तत्व का उपयोग । एवं तत्वाभ्यासान्नास्मि न मे नाहमित्यपरिशेषम् । अविपर्ययाद्विशुद्धं केवल मुत्पद्यते ज्ञानम्॥६४॥ इस सांख्यशास्त्र की रीति से जो तत्वों का निर्णय या निरूपण किया गया है उसके अनुसार तत्वों के अभ्यास करने से, उस में आदर करनेसे, निरन्तर दीर्घ काल तक मनन करने से प्रकृति और पुरुष के भेदको साक्षात्कार करने वाला ज्ञान उत्पन्न होता है, जो अविपर्यय या संशय तथा भ्रम से रहित होनेके कारण विशुद्ध, मिथ्या ज्ञानसे अमिश्रित होनेके कारण केवल, और किसी विषयका भी अपरिज्ञान न होनेके कारण अपरिशेष (सम्पूर्ण) होता है । उस ज्ञानका स्वरूप- “नास्मि” (मैं क्रिया शून्य हूँ ) “ नाहम् ” ( अकर्ता हूं ) “ नमे ” (स्वामिता रहित हूँ ) यह है ॥ ६४ ॥ पूरे विशुद्ध केवल ज्ञान का फल । तेन निवृत्तप्रसवामर्थवशात्सप्तरूपविनिवृत्ताम् । प्रकृतिंपश्यतिपुरुषःप्रेक्षकवदवस्थितःस्वच्छः॥६५॥ उस विशुद्ध तत्व ज्ञान से भोग, और विवेक के साक्षा- त्कार के प्रसव से निवृत्त, तथा विवेक ज्ञानरूप अर्थ के वश या सामर्थ्य से धर्म आदि ७ रूपों से निवृत्त हुई हुई प्रकृति को पुरुष दर्शकके समान अवस्थित और निष्क्रिय होकर देखता है, किन्तु उस अवस्थामें भी सात्विकी बुद्धिसे पुरुष का संभेद रहता है, अथवा उसकी छाया पुरुषमें पड़ती रहती है,अन्यथा ऐसी प्रकृति का दर्शन भी नहीं घट सकता ॥ ६५ ॥ मोक्ष के अनन्तर प्रकृति और पुरुष के रहते हुये भी सर्ग (सृष्टि) क्यों नहीं ? दृष्टामयेत्युपेक्षकएको, दृष्टाऽहमिति विरमत्यन्या।