सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ५६ ) सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शनका जीवात्मा में पड़ती है, इसीसे आत्मा सुख, दुःख वाला प्रतीत होता है इसी छायाको पुरुषका संसार समझना चाहिये । प्रकृति पुरुषके विवेक ज्ञानसे बुद्धिका नाश होजाता है, और उसके नाश के साथही सुख दुःखोंका भी नाश होजाता है, आत्मामें जिनकी छाया पड़ती है, उनके न रहनेसे आत्मा भी शुद्ध रह जाता है, इसी आत्मा की अवस्था का नाम मोक्ष है। न्याय-वैशेषिकका आत्मा । न्याय व वैशेषिक दर्शनके आचार्य कहते हैं कि-आत्मा विभु या व्यापक है ( १ ) संख्यासे अनन्त है अर्थात् कितने आत्मा हैं, ऐसे गिना नहीं जासकता ( २ ) नित्य है, अर्थात् भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीनों कालों में बना ही रहता है, उसका अभाव कभी नहीं होता ( ३ ) तथा प्रतिशरीर भिन्न होता है, एक कालमें उस का एकही शरीर से सम्बन्ध होता है, उसीमें सुख दुःखोंका उपभोग करता रहता है, यद्यपि वह सकल लोकों में रहता है, तो भी वह भिन्न लोकमें भी एक समयमें दूसरे शरीर को धारण नहीं कर सकता, किन्तु एक शरीरके नष्ट होनेके पश्चात् दूसरे शरीरको सृष्टि व महाप्रलय के मध्यकालमें मोक्ष होनेसे पहिले अवश्य ही धारण करता है ( ४ ) यह चारों बातें सांख्यवाले भी इसी प्रकार से आत्मामें स्वीकार करते हैं। (१) “विभवान्महानाकाशस्तथा चात्मा” ( वै० ७, १, २२) “जीवात्मा प्रति शरीरं भिन्नो विभुर्नित्यश्च” ( तर्क सं०) (२) “नानात्मानोव्यवस्थातः” ( व० ३, २, २० ) (३) “पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुबन्धाज्जातस्यहर्षभयशोकसंप्रतिपत्तेः” ( न्याय द० ३, १६१ ) (४) “शरीरोत्पत्तिनिमित्तवत्संयोगोत्पत्तिनिमित्तकर्म” (न्या य द० ३, १, ६६ )