भारतकोश
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

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तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन । (६३) होना तथा कभी कोई एक आत्मा मुक्त न हो ये दोनोंही बातें इनको स्वीकृत नहीं हैं । दूसरी बात यह है कि-एकही आत्मा रहे तो सभी जीवोंको एक के सुखी या दुःखी होनेपर सुखी या दुःखी होना पड़ेगा, किन्तु ऐसा नहीं होता है, इस लिए नाना आत्मा मानना आवश्यक है । आत्माको विभु या व्यापक इसलिए मानते हैं कि-यदि विभु न हो, किन्तु परमाणु रूप ही हो तो शरीरके सर्व देशोंमें कण्टकादि वेधसे दुःख और अनुकूल द्रव्यके संयोग से सुखकी प्रतीति होती है, यह दोनों बातें न होंगी, किन्तु नाना आ- त्मा जब विभु हैं तो वे तत्वतः अलग २ किस रीति पर सिद्ध होंगे या ख्यालमें आवेंगे, इस बातकी अधिक चिन्ता नहीं की । व्यापक आत्माके जन्म, मरण बन्ध, मोक्ष तथा स्वर्ग, नरकआदि लोकोंमें गमन की व्यवस्था कर ली है, जैसेकि-पहिले दिखाई जाचुकी है । शरीरके बराबर विभुत्व (व्यापकत्व) मानने में शरीर की वृद्धि व ह्रासके साथ आत्माकी भी वृद्धि तथा ह्रास मानना होगा, जिससे आत्माकी अनित्यता आती है, इसलिए पूर्ण रूपसे आकाशके समान आत्माको विभु मानने को ये बाध्य होते हैं । शुभ, अशुभ कर्मों से उत्पन्न होने वाले धर्म-अधर्म, जिन से आत्माओंको स्वर्ग और नरक आदि का भोग होता है, वे सब नित्य सम्बंध से आत्मा में ही रहते हैं । जिस आत्माके शरीर द्वारा कर्मों का अनुष्ठान होता है, उनसे होनेवाला अदृष्ट (धर्म-अधर्म) उसी आत्मामें रहता है, और उस का परिपाक होने पर उसी आत्मा को उसके फलो-