भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 100

·( ६६ ) ऐसा करके उनका त्याग करदेना, यह एक प्रकार की तुष्टि हुई। पैदा किये हुये धन को या तो चोर चुरा ले जायँगे या राजा दण्ड देकर छीन लेगा तो बड़ाभारी दुःख उत्पन्न होगा—ऐसा विचार कर जो त्यागना है, यह दूसरी तुष्टि है। यह धनादिक बड़े परिश्रम से संचय किया गया है, इसकी रक्षा करनी योग्य है। व्यर्थ न खोना चाहिये—ऐसा विचार करके जो विषय-वासना से बचना है, इसको तीसरी तुष्टि कहते हैं, भोग के अभ्यास से काम वृद्धि होती है और विषय के न प्राप्त होने से कामियों को बड़ाभारी कष्ट होता है। ऐसा विचार कर जो भोगों से बचना है, यह चौथी तुष्टि का लक्षण है। हिंसा वा दोषों के देखने से उपराम हो जाना, पाँचवीं तुष्टि का लक्षण है। यह पाँच प्रकार की तुष्टियों की व्याख्या केवल उपलक्षण मात्र की गई है। इनकी अवधि यहीं तक न समझकर इसी प्रकार की और भी तुष्टियाँ इन्हीं पाँच प्रकार की तुष्टियों में परिगणित कर लेनी चाहियें। ऊहादिभिः सिद्धिः ॥४४॥ अर्थ—'ऊह' शब्द, अध्ययन और तीनों प्रकार के दुःखों का नाश होना, मित्र का मिलना, दान करना—इस तरह आठ प्रकार की सिद्धि होती है। बिना किसी के उपदेश के पूर्वजन्म के संस्कारों से-तत्व को अपने आप विचारने का नाम ऊह है। दूसरे से सुनकर वा अपने आप शास्त्र को विचार कर जो ज्ञान उत्पन्न किया जाता है, उसका नाम शब्द है। शिष्य और आचार्य- भाव से शास्त्र पढ़कर ज्ञानवान् होने को अध्ययन कहते हैं। यदि कोई दयावान् अपने स्थान पर ही उपदेश देने आया हो, और उसी उपदेश से ज्ञान होगया हो, इसको सुहृत्प्राप्ति कहते हैं और धन आदि देकर ज्ञान का जो प्राप्त करना है, उसको दान कहते हैं, और पूर्वोक्त आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक, तीन

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका · पृष्ठ 100, कुल 192 में से · BharatKosha