भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १०३ ) है, कभी मरण को प्राप्त होता है, और ऐसा कहने से आचार्य का यह तात्पर्य नहीं है कि मुक्त-जीव कभी जन्म को नहीं प्राप्त होता ; क्योंकि प्रथम तो आचार्य जीव को नित्य मानते हैं, जब उसका कारण ही नहीं तो लय किसमें होगा। दूसरे जो डूबे हुये का दृष्टान्त दिया, अशान्ति का पोपक दिया तथा इस में पराधीनता दिखाई ; किन्तु मुक्त-जीवन तो न अशान्त है न पराये अधीन है। तीसरे यहाँ पर सृष्टि का प्रसंग चला आता है, किन्तु जीव का विषय भी नहीं है ; इसलिये अन्तःकरण के सुषुप्ति में प्रकृति में लय होने से तात्पर्य है। प्र०—जबकि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं, तो प्रकृति ही में सृष्टि का कर्तृत्व क्यों माना जाता है ? उ०—अकार्यत्वेऽपि तद्योगः पारवश्यात् ॥५५॥ अर्थ—यद्यपि प्रकृति और पुरुष दोनों अकार्य अर्थात् नित्य हैं तथापि प्रकृति को ही सृष्टि करने का योग है ; क्योंकि जो परवश होगा वही तो कार्य को करेगा। इस विचार से प्रकृति ही में परवशता दीखती है। प्र०—स हि सर्ववित् सर्वकर्त्ता ॥५६॥ अर्थ—यदि प्रकृतिरूपी पदार्थ को सर्वज्ञ और सर्ववित् ( "विद् सत्तायाम्" इस धातु का प्रयोग है ) सर्वशक्तिमान् मान लिया जाय तो क्या हानि है ? उ०—ईदृशेश्वरसिद्धिः सिद्धा ॥ ५७ ॥ अर्थ—इस तरह वेद के प्रमाणों से ईश्वर को सिद्धि सिद्ध है। प्रकृति में सर्वज्ञत्वादि गुण तो किसी सूरत में नहीं हो सकते हैं, सर्वज्ञत्वादि गुण तो ईश्वर ही में हैं। प्र०—प्रकृति ने सृष्टि को क्यों पैदा किया ?