भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १२६ ) नाममात्र ही रह जाने में यह भी दोष होगा, कि वर्तमान् संसार की सिद्धि भी न हो सकेगी । . न रागादृते तत्सिद्धिः प्रतिनियतकारणत्वात्॥६॥ अर्थ—ईश्वर सृष्टि की सिद्धि में प्रति_नियत कारण है, उसके बिना केवल राग से अर्थात् प्रकृति महदादिकों से संसार की सिद्धि नहीं हो सकती । प्र०—ईश्वर, जीव रूपधारी प्रकृति का सङ्गी है, और उस में प्रकृति के संयोग होने से रागादिक भी हैं ? उ०—तद्योगेऽपि न नित्यमुक्तः ॥ ७ ॥ अर्थ—तुम्हारा यह कथन योग्य ( सत्य ) नहीं, क्योंकि ईश्वर नित्य मुक्त न रहेगा, अर्थात् जैसे जीव प्रकृति के संगी होने से अनित्य मुक्त है । इसी तरह ईश्वर को भी मानना पड़ेगा । और जो लोग इस तरह ईश्वर को मानते हैं, उनका ईश्वर भी संसार के जीवों के समान अनित्य मुक्त होगा । यदि ऐसा कहा जावे कि ईश्वर से संसार बना है, अर्थात् ईश्वर उपादान कारण है, सो भी सत्य नहीं । प्रधानशक्तियोगाच्चेत् संगापत्तिः ॥ ८ ॥ अर्थ—यदि ईश्वर को प्रधान शक्ति का योग हो, तो पुरुष में सङ्गापत्ति हो जाय, अर्थात् जैसे प्रकृति सूक्ष्म से मिलकर कार्य- रूप में संगत हुई है, वैसे ईश्वर भी स्थूल हो जाय ; इसवास्ते ईश्वर जगत् का उपादान कारण नहीं हो सकता, किन्तु निमित्त- कारण है । सत्तामात्राच्चेत् सर्वैश्वर्यम् ॥ ६ ॥

  • अर्थ—अगर चेतन से जगत् की उत्पत्ति है, तो जिस प्रकार