भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १३० ) श्रुतिलिंगादिभिस्तत्सिद्धिः ॥ २१ ॥ अर्थ—उसकी सिद्धि श्रुति और योगियों के प्रत्यक्ष से हो सकती है । “पुण्यो वै पुण्येन भवति पापः पापेन” पुण्य निश्चय करके पुण्य से होता है, और यह भी निश्चय है, कि पाप, पाप से ही उत्पन्न होता है, इत्यादि श्रुतियाँ भी धर्म के फल को कहती हैं, इसवास्ते धर्म का अपलाप नहीं हो सकता । प्र०—धर्म में कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है, इस वास्ते उसकी सिद्धि नहीं हो सकती ? उ०—न नियमः प्रमाणान्तरावकाशात् ॥ २२ ॥ अर्थ—धर्म की सिद्धि प्रत्यक्ष प्रमाण से ही हो, यह कोई नियम नहीं है, क्योंकि इसमें अनेक प्रमाण हैं, और प्रत्यक्ष प्रमाण के सिवाय और प्रमाणों से भी पदार्थ की सिद्धि होती है । प्र०—धर्म की तो सिद्धि इस तरह करली गई, लेकिन अधर्म की तो सिद्धि किसी प्रमाण से नहीं हो सकती ? उ०—उभयत्राप्येवम् ॥ २३ ॥ अर्थ—जैसे धर्म की सिद्धि में प्रमाण पाए जाते हैं इसी तरह अधर्म की सिद्धि में भी प्रमाण पाये जाते हैं । अर्थात् सिद्धिश्चेत् समानमुभयोः ॥ २४ ॥ अर्थ—वेदादि सत् शास्त्रों में जिस बात की विधि पाई जाती है वही धर्म है, और इसके सिवाय अधर्म है। यदि इस प्रकार की अर्थापत्ति निकाली जाय, तौ भी ठीक नहीं, क्योंकि श्रुति आदिकों में जिस प्रकार धर्म की विधियों का वर्णन है उस ही प्रकार अधर्म का निषेध भी है, जैसे—“परदारान्नगच्छेत्” पराई स्त्री के समीप