भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १३२ ) प्रकृति के गुण मानना सत्य नहीं, इस पक्ष के खण्डन के वास्ते यह सूत्र है— गुणादीनां च नात्यन्तबाधः ॥ २६ ॥ अर्थ—गुण जो सत्वादिक अर्थात् सत्व, रज, तम, उनके धर्म जो सुखादिक और उनके कार्य जो महदादिक हैं, उनका स्वरूप से बाध्य नहीं है, अर्थात् स्वरूप से नाश नहीं होता ; किन्तु संसर्ग से बाध्य होता है, जैसे—आग के संसर्ग ( मेल ) से जल की स्वाभाविक शीतलता का बाध्य हो जाता है, परन्तु उसके स्वरूप का बाध्य नहीं होता ; इसी तरह प्रकृति के गुणों का भी बाध्य नहीं होता । पंचऽवयवयोगात् सुखसंवित्तिः ॥ २७ ॥ अर्थ—सुखादि पदार्थों की सिद्धि पंचावयव वाक्य से होती है, जिस तरह न्याय-शास्त्र में मानी गई है। इस कारण जब सुख आदि की सिद्धि न्याय-शास्त्र के अनुसार मान ली जाती है, तब उनका स्वरूप से नाश भी नहीं माना जा सकता। क्यों- कि जो पदार्थ सत् है, उसका नाश नहीं हो सकता, और उस पंचावयव वाक्य से सुखादि की संवित्ति इस तरह होती है, कि प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन इन पाँचों को सुख में इस तरह लगाना चाहिये, कि सुख सत् है, इसका नाम प्रतिज्ञा है ; प्रयोजन क्रियाकारी होने से इसका नाम हेतु है, जैसे चेतन प्रयोजन की क्रियाओं का कर्त्ता है, उसी तरह इसका नाम भी दृष्टान्त है। पुलकित ( रूंओं का खड़ा होना ) आदि प्रयोजन की क्रिया सुख में है, इसका नाम उपनयन है ; इस- वास्ते वह सच्चा है, यह निगमन है। यहाँ केवल सुख का ग्रहण करना नाममात्र ही है। इसी तरह और गुणों का स्वरूप से

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