भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १६५ ) प्र०—सृष्टि कितने प्रकार की है ? उ०—छः प्रकार की, देखो— ऊष्मजाण्डजजरायुजोद्भिज्जसांकल्पिक सांसि- द्धिकंचेति न नियमः ॥ १११ ॥ अर्थ—( १ ) ऊष्मज (जो पसीने से पैदा होते हैं, जैसे लीख आदि ) ; अण्डज ( जो अण्डे से पैदा होते हैं, जैसे मुर्गी आदि ); ( ३ ) जरायुज (जो झिल्ली से पैदा होते हैं, मनुष्य आदि); ( ४ ) उद्भिज (जो जमीन को फोड़कर पैदा होते हैं, पेड़ आदि) ; ( ५ ) सांकल्पिक ( जैसे सृष्टि के आदि में बिना माता-पिता के देवऋषि पैदा होते हैं ; ( ६ ) सांसिद्धिक ( जैसे खान में धातु बनते हैं ) । आचार्य ( कपिलजी ) ने यही छः प्रकार की सृष्टि मानी है ; लेकिन इन छः प्रकार के सिवाय और किसी तरह की सृष्टि नहीं है, ऐसा नियम भी नहीं ; क्योंकि शायद किसी दशा में भूतों की सृष्टि इनसे अन्य प्रकार की हो । आचार्य के निश्चय ( तहक़ी- क़ात से तो छः ही प्रकार की सृष्टि देखने में आती है । सर्वेषु पृथिव्युपादानमसाधारणत्वात् तद्व्यप- देशः पूर्ववत् ॥ ११२ ॥ अर्थ—इन सब प्रकार की सृष्टियों का साधारण उपादान कारण पृथिवी है, इसलिये इनको पार्थिव कहना योग्य है, और जो पांचभूतों का व्यपदेश ( नाम ) सुना जाता है वह पूर्व- कथन ( पहिले कहा हुआ ) के समान समझना चाहिये अर्थात् मुख्य उपादान कारण पृथिवी है और सब गौण हैं । प्र०—इस शरीर में प्राण ही प्रधान (मुख्य ) है, इसलिये प्राण को ही देह का कर्त्ता मानना चाहिये ?

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