भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( १७८ ) प्रश्न हो सकता है—यदि कर्मों से इसकी उत्पत्ति मानें तो इस प्रश्न को अवकाश मिलता है कि कर्म किससे उत्पन्न हुये हैं; इसलिये इन दोनों दोषों के दूर करने के लिये अविवेक को अनादि मानना चाहिये । न नित्यः स्यादात्मवदन्यथानुच्छित्तिः ॥१३॥ अर्थ—अविवेक नित्य नहीं हो सकता । यदि नित्य ही माना जायगा तो उसका नाश हो सकेगा; जैसे—आत्मा का नाश नहीं होता है और उस अविवेक के नाश न होने से मुक्ति न हो सकेगी, इसलिये अविवेक को प्रवाहरूप से अनादि ( अनित्य ) मानना चाहिये । प्रतिनियतकारणनाश्यत्वमस्य ध्वान्तवत् ॥१४॥ अर्थ—यह अविवेक भी प्रतिनियत कारण से नाश हो जाता है, इसलिये अनित्य है; जैसे—अँधेरा प्रकाश रूप प्रतिनियत कारण से नाश हो जाता है, इसलिये वह अविवेक नित्य नहीं हो सकता । प्र०—प्रतिनियत कारण किसको कहते हैं ? उ०—जिससे उस कार्य की उत्पत्ति वा नाश होजाय, जैसा— अन्धेरे के दृष्टान्त से समझ लेना चाहिये । अत्रापि प्रतिनियमोऽन्वयव्यतिरेकात् ॥१५॥ अर्थ—इस अविवेक के नाश करने में भी प्रतिनियत ( जिस से अवश्य नाश हो जाय ) अन्वय व्यतिरेक से निश्चय कर लेना चाहिये । वह अन्वय यही है कि विवेक के होने से इसका नाश और विवेक के न होने से अविवेक का होना प्रतीत होता है, यही अन्वय व्यतिरेक कहने का तात्पर्य है ।