सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १८३ ) का कारण परमाणु है, इसी तरह परम्परा सम्बन्ध से भी सबका कारण प्रकृति ही है । सर्वत्र कार्यदर्शनाद्विभुत्वम् ॥ ३६ ॥ अर्थ—प्रकृति के कार्य सब जगह दीखते हैं इस कारण प्रकृति विभु है । गतियोगेऽप्याद्यकारणताहानिरणुवत् ॥ ३७ ॥ अर्थ—यद्यपि शरीर में गमनादि क्रियाओं का योग है तो भी उसका आद्य कारण ( पहिला सबब ) अवश्य मानना होगा ; जैसे—अणु यद्यपि सूक्ष्म हैं तथापि उनका कारण अवश्य ही माना जाता है । प्रसिद्धाधिक्यं प्रधानस्य न नियमः ॥ ३८ ॥ अर्थ—प्रसिद्धता तो प्रकृति को दीखती है, इससे अधिक द्रव्यों को मानने का नियम ठीक नहीं है, क्योंकि कोई तो नौ द्रव्य मानते हैं, कोई सोलह द्रव्य मानते हैं, इस कारण उनका कोई नियम ठीक नहीं है, और प्रकृति के सब कार्य दीख रहे हैं ; इसलिये उसके ही कारण मानना चाहिये । सत्वादीनामतद्धर्मत्वं तद्रू पत्वात् ॥ ३६ ॥ अर्थ—सत्व, रज, तम, यह प्रकृति के धर्म नहीं हैं, किंतु प्रकृति के रूप हैं। सत्यादि रूप ही प्रकृति है । अनुपभोगेऽपि पुमर्थं सृष्टिःप्रधानस्योष्ट्रकुंकुम वहनवत् ॥ ४० ॥ अर्थ—यद्यपि प्रकृति अपनी सृष्टि का आप भोग नहीं करती तथापि उसकी सृष्टि पुरुष के लिये है ; जैसे—ऊँट अपने स्वामी के लिये केशर को लेजाता है, ऐसे ही प्रकृति भी सृष्टि करती है ॥