भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

( १८५ ) पुरुषबहुत्वं व्यवस्थातः ॥४५॥ अर्थ—जीव बहुत हैं; क्योंकि प्रत्येक शरीर में उनकी अलग- अलग व्यवस्था होती है । उपाधिश्चेत् तत्सिद्धौ पुनर्द्वैतम् ॥४६॥ अर्थ—यदि ऐसा कहा जाय कि सूर्य एक है, परन्तु उसकी छाया के अनेकों स्थानों में पड़ने से अनेक सूर्य दीखने लगते हैं; इसी प्रकार ईश्वर एक है किंतु शरीररूपी उपाधियों के होने से अनेकता है तो भी ऐसा कहना ठीक नहीं हैं, क्योंकि जो एक ब्रह्म के सिवाय और दूसरे को मानते ही नहीं है यदि वह लोग ब्रह्म और उपाधि को मानेंगे तो अद्वैतवाद न रहेगा, किंतु द्वैतवाद होजायगा । द्वाभ्यामपि प्रमाणविरोधः ॥४७॥ अर्थ—यदि दोनों ही मानें तो प्रमाण से विरोध होता है, क्योंकि यदि उपाधि को सत्य मानें तो जिन प्रमाणों से अद्वैत की सिद्धि करते हैं उनसे विरोध होगा। यदि उपाधि को मिथ्या मानें तो जिन प्रमाणों से उपाधि को सिद्ध करते हैं उनसे विरोध होगा। अब इस विषय पर आचार्य अपना मत कहते हैं:— द्वाभ्यामप्यविरोधान्न पूर्व्वमुत्तरं च साधकाभा- वात् ॥४८॥ द्वैत, अद्वैत इन दोनों से हमारा कोई विरोध नहीं है; क्योंकि ईश्वर अद्वैत तो इसलिये है कि उसके बराबर और कोई नहीं है। द्वैत इसवास्ते है कि जीव और प्रकृति के गुण ईश्वर की अपेक्षा और प्रकार के मालूम होते हैं, इसवास्ते ऐसा न कहना