सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १८७ ) जगत् सत्यत्वम दुष्टाकारण जन्यत्वाद् बाधका भावात् ॥ ५२ ॥ अर्थ—जगत् सत्य है, क्योंकि इसका कारण नित्य है और किसी समय में भी इसका बाध ( रोक ) नहीं दीखता है । इस सूत्र का आशय पहिले अध्याय में कह आये हैं, इसलिये विस्तार नहीं किया है । प्रकारान्तरासम्भवात् सदुत्पत्तिः ॥५३॥ अर्थ—जबकि प्रकृति के सिवाय और कोई कारण इसका दीखता नहीं, तो ऐसा कहना चाहियं कि इसकी उत्पत्ति असत् पदार्थ से नहीं है, किन्तु सत् पदार्थ से ही है । अहङ्कारः कर्त्ता न पुरुषः ॥५४॥ अर्थ—संकल्प-विकल्प आदियों का कर्त्ता अहङ्कार है, किन्तु जीव नहीं है ; क्योंकि जो विचार बुद्धि में उत्पन्न होता है उसके बाद मनुष्य कार्यों के करने में लगता है और उस बुद्धि को पुरुष का प्रतिबिम्ब ही प्रकाश करता है । चिदवसाना भुक्तिस्तत्कर्मार्जितत्वात् ॥५५॥ अर्थ—जिसका अन्त जीव में हो उसको भोग कहते हैं, वे भोग जीव के कर्मों से होते हैं, इस कारण भोगों का अन्त जीव में मानना चाहिये । चन्द्रादिलोकेऽप्यावृत्तिर्निमित्तसद्भावात् ॥५६॥ अर्थ—चन्द्रलोक के जीवों में भी आवृत्ति दीखती हैं, क्योंकि जिस निमित्त से मुक्ति और बन्ध होते हैं वह वहां के जीवों में भी बराबर ही दीखते हैं । भाव यह है कि चन्द्रादि लोकों के