सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २६ ) स्थूलात् पञ्चतन्मात्राय ॥ ६२ ॥ अर्थ—इन पांच प्रकाशवान् तत्त्वों से उन सूक्ष्म तन्मात्रों का अनुमान होता है, जिस प्रकार कार्य्य को देखकर कारण का अनुमान होता है ; जैसे लिखा है— कारणगुणपूर्वकं कार्य्य गुणो दृष्टः ॥ अर्थ—कार्य्य के गुणों के अनुसार कारण और कारण के अनुसार कार्य्य के गुणों का अनुमान होता है । इसी प्रकार यहां कार्य्य तत्त्वों को देख कर कारण तन्मात्रा का ज्ञान हो जाता है । बाह्याभ्यन्तराभ्यां तैश्चाहङ्कारंस्य ॥ ६३ ॥ अर्थ—बाहर की और आभ्यन्तर्रीय इन्द्रियों से पञ्च तन्मात्रा रूप कार्य का ज्ञान होकर उसके कारण अहङ्कार का भी ज्ञान होता है, क्योंकि स्पर्शादि विषयों का ज्ञान समाधि और सुषुप्ति अवस्था में जबकि अहङ्कार रूप वृत्ति का अभाव होता है नहीं होता, इससे अनुमान होता है कि यह इस वृत्ति से उत्पन्न होते हैं, अर्थात् अहङ्कार के कार्य्य हैं और अहङ्कार इनका कारण है ; क्योंकि यह नियम है कि जो जिसके बिना पैदा न हो सके वह उसका कारण होता है, और भूत विना अहङ्कार के सुषुप्ति अवस्था में दृष्टिगत नहीं होते, अतएव यही उनका कारण अनुमान से प्रतीत होता है । तेनान्तःकरणस्य ॥ ६४ ॥ अर्थ—और अहङ्काररुपी कार्य्य से उसके कारण अन्तःकरण का अनुमान होता है, क्योंकि प्रथम मन में वस्तु की अस्तित्व का निश्चय करके उसमें अहङ्ककार किया जाता है, अर्थात् उसे अपना