सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३७ ) उ०—तत्सिद्धौ सर्वसिद्धेर्नाधिक्यसिद्धिः॥८८॥ अर्थ—इन तीन प्रमाणों के सिद्ध होने से सब पदार्थों की सिद्धि हो जाती है, इसलिये और प्रमाण माँगने की आवश्यकता नहीं ; क्योंकि महात्मा मनु ने भी लिखा है । प्रत्यक्षञ्चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम् । त्रयं सुविदितं कार्य्यं धर्मशुद्धिमभीप्सता । अर्थ—प्रत्यक्ष, अनुमान और शास्त्र के अनुकूल जानकर कार्य करना चाहिये ; क्योंकि धर्म की शुद्धि की इच्छावालों की इच्छा इनसे पूरी होसकती है और उपमानादि प्रमाण इन्हीं के अन्दर आजाते हैं । यत्सम्बद्धं सत्तदाकारोल्लेखि विज्ञानं तत् प्रत्यक्षम् ॥ ८९ ॥ जिस सामने उपस्थित पदार्थ के साथ ज्ञानेन्द्रिय का सम्बन्ध हो और मन को भी उस इन्द्रिय के द्वारा उसका यथार्थ बोध होजाय, तो उसे प्रत्यक्ष ज्ञान कहते हैं और इस ज्ञान का कारण ज्ञानेन्द्रिय और मन की वृत्ति है । इसलिये मन और इन्द्रियें प्रत्यक्ष प्रमाण कहलाती हैं और इनका विषय केवल प्राकृत पदार्थ ही हैं । प्रत्यक्ष से अप्राकृत पदार्थों का ज्ञान नहीं होसकता । प्र०—योगियों को तीनों काल के पदार्थों का साक्षात ज्ञान हो सकता है और योगी समाधि अवस्था में आत्मा और अन्दर के पदार्थों को प्रत्यक्ष करता है, इस वास्ते तुम्हारा प्रत्यक्ष का लक्षण ठीक नहीं ? उ०—योगिनामबाह्यप्रत्यक्षत्वान्नदोषः ॥ ९० ॥