सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ६२ ) उ०—जन्मादिव्यवस्थातः पुरुषबहुत्वम् ॥१४९॥ संसार में जन्म को आदि लेकर अनेक अवस्था देखने में आती हैं, तो इससे ही सिद्ध होता है, कि पुरुष बहुत हैं; क्योंकि यदि सब अन्तःकरण की वृत्तियों का आधार एक ही पुरुष होता, तो यह घट है, इस घट को मैं जानता हूँ, इस घट को मैं देखता हूँ। इस प्रकार का अनुभव जिस क्षण में एक अन्तःकरण को होता है, उसी क्षण में सब अन्तःकरणों को होना चाहिये; क्यों- कि वह एक ही सबका आश्रयी है, लेकिन संसार में ऐसा देखने में नहीं आता, इस कारण पुरुष अनेक हैं, और जो कोई-कोई टीकाकार इस सूत्र का यह अर्थ करते हैं कि जन्मादि व्यवस्था ही से बहुत से पुरुष प्रतीत (मालूम) होते हैं वस्तुतः नहीं। उनका कहना इस कारण अयोग्य है "पुण्यवान् स्वर्गं जायते, पापी नरके, अज्ञोबध्यते, ज्ञानी मुच्यते।" पुण्यात्मा स्वर्ग में पैदा होता है, और पापी नरक में पैदा होता है; अज्ञ बन्धन को प्राप्त होता है, ज्ञानी मुक्त होता है, इत्यादि श्रुतियां बहुत्व (बहुत सारों) को प्रतिपादन (सुबूत) करती हैं उनसे विरोध होगा। प्र०—एक पुरुष की ही अनेक जन्मादि व्यवस्था हो सकती हैं, या एक पुरुष की एक ही जन्मादि व्यवस्था है ? उ०—उपाधि भेदेप्येकस्य नानायोग आकाश- स्येव घटादिभिः ॥ १५० ॥ अर्थ—उपाधिभेद (शरीरादि) होने पर भी एक पुरुष का अनेक जन्मों में अनेक शरीरों से योग- (मेल) होता है; जैसेकि एक आकाश का घटादिकों के साथ योग होता है। (खुलासा) एक ही पुरुष जन्मान्तर में अनेक उपाधियों को धारण करता है, और अनेक योग वाला कहाता है, आकाश के