भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 65

( ६४ ) विम्व मानते हैं, तो देखते हैं, कि प्रतिबिम्ब जड़ है। अतएव पुरुष को भोक्ता, बद्ध, मुक्त, कभी नहीं कह सकते हैं, और जीव, ब्रह्म को एकता के विषय में हानि प्राप्त होगी। अतएव सांख्य मतानुसार, जीव, ब्रह्म को एक मानना भी नहीं हो सकता है। एक ही ब्रह्म जीव रूप को धारण करता है इस पक्ष का खण्डन इस सूत्र से होता है— एवमैकत्वेन परिवर्तमानस्य न विरुद्ध धर्मा- ध्यासः ॥ १५२ ॥ अर्थ—यदि एक ही ब्रह्म सम्पूर्ण उपाधियों से मिलकर जीव रूप हो जाता है, तो उसमें विरुद्ध धर्म दुःख बन्धनादि का अध्यास अवश्य होगा, इस कारण जीव, ब्रह्म को एक मानना योग्य नहीं है। प्र०—जबकि पुरुष को निर्धर्म कह चुके, तब, जन्म, मरण, मोक्ष, बन्ध आदि धर्म क्योंकर हो सकते हैं ? उ०—यह धर्म परिणामी नहीं है, जैसे—स्फटिक मणि के पास काला, पीला, हरा इत्यादि रङ्गों के रख देने से वह मणि भी नीली, पीली, काली दीखने लगती है, लेकिन मणि तो वास्तव में सफेद ही है, इस प्रकार ही पुरुष में भी मन के धर्म सुख, दुःखादि शरीर के धर्म, पिता, पुत्रादि प्रतीत होते हैं। अन्यधर्मत्वेपि नारोपात् तत्सिद्धेरेकत्वात् ॥१५३ अर्थ—मन आदिकों का धर्म जो सुख, दुःखादि उस धर्म का पुरुष में आरोप करने पर भी पुरुष को परिणामित्व की सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि सुख, दुःखादि पुरुष के धर्म नहीं हैं, किन्तु मत के धर्म हैं। पुरुष जन्मान्तर में एक ही बना रहता है। जब हर एक शरीर में एक-एक पुरुष है तो नाना पुरुष सिद्ध हुए