भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ७१ ) उ०—बहुभृत्यवद्वा प्रत्येकम् ॥ ४ ॥ अर्थ—जैसे एक गृहस्थ से सैकड़ों नौकर बाल, वृद्ध, स्त्री, पुरुष आदि का क्रम से भरण-पोषण ( भोजन, वस्त्र आदि ) होता है, इसी प्रकार प्रकृति के सत्त्वादि गुण प्रत्येक सैकड़ों पुरुषों को क्रम से मुक्त कर देते हैं, इसवास्ते कोई-कोई मुक्त हो भी जाते हैं; लेकिन और जो बाक़ी मनुष्य हैं उनकी मुक्ति के वास्ते सृष्टिप्रवाह की आवश्यकता है, क्योंकि पुरुष अनन्त है । प्र०—प्रकृति सृष्टि की कारण है, इसमें क्या हेतु है ? क्योंकि पुरुष को ही कारण सब मानते हैं ? उ०—प्रकृतिवास्तवे च पुरुषस्याध्याससिद्धिः॥५ अर्थ—यद्यपि वास्तव में ( निस्सन्देह ) प्रकृति ही सृष्टि का कारण है तथापि ( तौ भी ) सृष्टि के करने में पुरुष की अध्यास सिद्धि है । प्र०—अध्यास किसको कहते हैं ? उ०—अध्यास उसे कहते हैं कि काम दूसरा करे और नाम दूसरे का हो, जैसे कि—लड़ाई में योद्धा ( वीर लोग ) अपनी शक्ति से जीत और हार करते हैं; लेकिन वह जीत-हार सब राजा ही की गिनी जाती है. इसको ही अध्यास कहते हैं । प्र०—वास्तव में प्रकृति ही सृष्टि करनेवाली कैसे है ? क्योंकि सृष्टि को अनित्य शास्त्रों ने प्रतिपादन ( सबूत ) किया है । यदि ऐसा है तो उस सृष्टि का कारण, जो प्रकृति है, वह भी अनित्य होगी ? उ०—कार्यतस्तत्सिद्धेः ॥ ६ ॥ अर्थ—कार्यों के देखने ही से प्रकृति के वास्तव कारणत्व ( कारण होने ) की सिद्धि हो सकती है, क्योंकि यह सृष्टिरूपी