सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ७४ ) उ०—महदादिक प्रकृति के ही कार्य हैं, इस कारण 'पर' शब्द से पुरुष का ही ग्रहण होगा । प्र०—दिशा और काल की सृष्टि किस प्रकार से हुई ? उ०—दिक्कालावाकाशादिभ्यः ॥ १२ ॥ अर्थ—दिशा और काल यह दोनों आकाश से उत्पन्न हुये, इस कारण यह दोनों आकाश के समान नित्य हैं, अर्थात् आकाश में जो व्यापकता है, वह व्यापकता इन दोनों में भी है, इस कारण यह दोनों नित्य हैं। और जो खण्ड दिशा और काल हैं, सो उपाधियों के मेल से आकाश से उत्पन्न होते हैं, वे अनित्य होते हैं। अब बुद्धि का स्वरूप और धर्म दिखाते हैं। अध्यवसायोबुद्धिः ॥ १३ ॥ अर्थ—निश्चयात्मक ज्ञान का नाम बुद्धि है, और अध्यवसाय नाम निश्चय का है, उस निश्चय को ही बुद्धि कहते हैं। तत्कार्यं धर्म्मादि ॥ १४ ॥ प्र०—उस बुद्धि के कार्य धर्मादिक हैं तो मूर्ख पुरुषों की बुद्धि में ज्ञानादि निन्दित क्यों प्रबल ( बलवान्. ) होते हैं ? उ०—महदुपरागाद्विपरीतम् ॥ १५ ॥ अर्थ—मन के संयोग होने से यदि मन में मिथ्याज्ञान के संस्कार हैं तो धर्मादिक विपरीत ( उलटे ) होजाते हैं, अर्थात् अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य, यह सब विपरीत होजाते हैं। अब महत्तत्व के कार्य अहंकार को दिखाते हैं। अभिमानोऽहंकारः ॥ १६ ॥