भारतकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ८७ ) प्र०—परिमुक्त शब्द का अर्थ तो छूटना है, आप बद्ध अर्थ करते हैं ? उ०—पहले अध्याय के सूत्रों में पुरुष को भोक्तृत्वादि विशेषण दे चुके हैं, इस कारण यहां अभोक्ता कहना अयोग्य है। दूसरे संसार दशा में ही पुरुष को सुख-दुःख न होंगे, तो क्या मुक्त अवस्था में होंगे और जो सुख-दुःख ही नहीं है, तो मुक्ति का उपाय भी कोई न करेगा। तीसरे परिमुक्त शब्द का अर्थ मुक्त करना भी अयोग्य है। यहाँ 'परि' शब्द का अर्थ बद्ध करना ही ठीक है। अब स्थूल और सूक्ष्म दोनों तरह के शरीरों के भेद कहते हैं। मातापितृजं स्थूलं प्रायश इतरन्न तथा ॥ ७ ॥ अर्थ—स्थूल शरीर दो तरह के होते हैं—एक तो वह जो माता के संगम से पैदा होते हैं; दूसरे वह जो बिन माता-पिता के उत्पन्न हों, जैसे वर्षाऋतु में वीरबहूटी इत्यादिक होते हैं। प्र०—पूर्व सूत्रों से साबित हुआ कि तीन प्रकार के शरीर हैं, लेकिन पुरुष कौनसे शरीर की उपाधियों से सुख-दुःख का भोक्ता होता है ? उ०—पूर्वोत्पत्तेस्तत्कार्यत्वं भोगादेकस्यनेतरस्य ८ अर्थ—लिङ्ग-शरीर की उपाधियों से ही पुरुष को सुख-दुःख होते हैं, क्योंकि संसार के आदि में लिङ्ग-शरीर की ही उत्पत्ति है, इस कारण सुखादिक इसके कार्य हैं; अतः एक लिङ्ग- शरीर की उपाधियों से ही पुरुष को सुखादिक हैं, किन्तु स्थूल शरीर की उपाधियों से नहीं होते; क्योंकि जब स्थूल शरीर मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, तब उसमें सुखादिक नहीं देखने में आते। प्र०—सूक्ष्म शरीर का स्वरूप क्या है ?