भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * जगत्‌की भ्रमरूपता एवं मिथ्यात्वका निरूपण * ६९


अपने शिष्य श्रीरामको शीघ्र उपदेश दीजिये, जिससे ये विश्राम ( शान्ति ) को प्राप्त हों । इसमें आपको अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ेगा; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजी सर्वथा निष्पाप हैं । अतः जैसे निर्मल दर्पणमें बिना यत्नके ही मुँहका प्रतिबिम्ब दिखायी देने लगता है, उसी प्रकार श्रीरामचन्द्रजीको अनायास ही ज्ञेय वस्तुका बोध एवं विश्राम प्राप्त हो जायगा । महात्मन् ! वही ज्ञान, वही शास्त्रार्थ और वही पाण्डित्य सार्थक एवं प्रशंसित है, जिसका वैराग्ययुक्त उत्तम शिष्यके लिये उपदेश दिया जाता है । जिसमें वैराग्य नहीं है तथा जो शिष्यभावसे रहित है, उसे जो कुछ भी उपदेश दिया जाता है, वह कुत्तेके चमड़ेसे बने हुए कुप्पेमें रखे हुए गायके दूधकी भाँति अपवित्रताको प्राप्त हो जाता है । जहाँ आप-जैसे वीतराग, निर्भय, क्रोधशून्य, अभिमानरहित तथा निष्पाप महापुरुष तत्त्वज्ञानका उपदेश देते हैं, वहाँ तत्काल बुद्धिको विश्राम प्राप्त होता है ।

गाधिनन्दन विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर व्यास और नारद आदि उन सभी मुनियोंने साधु-साधु कहकर उनके उस कथनकी ही भूरि-भूरि प्रशंसा की। तत्पश्चात् राजा दशरथके बगलमें बैठे हुए ब्रह्माजीके पुत्र महातेजस्वी भगवान् वसिष्ठ मुनिने, जो ब्रह्माजीके समान ही ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न थे, कहा ।

श्रीवसिष्ठजी बोले—मुने ! आप जिस कार्यके लिये मुझे आज्ञा दे रहे हैं, उसे मैं बिना किसी विघ्न-बाधाके आरम्भ कर रहा हूँ । शक्तिशाली होकर भी संतोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है ! पूर्वकालमें निषध पर्वतपर पूजनीय पद्मयोनि ब्रह्माजीने संसाररूपी भ्रमको दूर करनेके लिये जिस ज्ञानका उपदेश किया था, वह सब अविकलरूपसे मुझे याद है । ( सर्ग २ )


जगत्‌की भ्रमरूपता एवं मिथ्यात्वका निरूपण, सदेह और विदेह मुक्तिकी समानता तथा शास्त्रनियन्त्रित पौरुषकी महत्ताका वर्णन

श्रीवसिष्ठजीने कहा—पूर्वकालमें सृष्टिके प्रारम्भके समय भगवान् ब्रह्माने संसाररूपी भ्रमके निवारणके लिये जिस ज्ञानका उपदेश दिया था, उसीका मैं यहाँ वर्णन करता हूँ । यह जगत् सङ्कल्पके निर्माण, मनोराज्यके विलास, इन्द्रजालद्वारा रचित पुष्पहार, कथा-कहानीके अर्थके प्रतिभास, वातरोगके कारण प्रतीत होनेवाले भूकम्प, बालकको डरानेके लिये कल्पित पिशाच, निर्मल आकाशमें कल्पित मोतियोंके ढेर, नावके चलनेसे तथा प्रतीत होनेवाली वृक्षोंकी गति, स्वप्नमें देखे गये नगर अन्यत्र देखे गये फूलोंके स्मरणसे आकाशमें कल्पित हुए पुष्पकी भाँति भ्रमद्वारा निर्मित हुआ है । मृत्युकालमें पुरुष स्वयं अपने हृदयमें इसका अनुभव करता है ।

इस प्रकार जगत् मिथ्या होनेपर भी चिरकालतक अत्यन्त परिचयमें आनेके कारण घनीभाव ( दृढ़ता ) को प्राप्त होकर जीवके हृदयाकाशमें प्रकाशित हो बढ़ने लगता है । यही 'इहलोक' कहलाता है । जन्मसे लेकर मृत्युतककी चेष्टाओं तथा मरण आदिका अनुभव करनेवाला जीव वही ( हृदयाकाशमें ही ) इहलोककी कल्पना करता है, जैसा कि ऊपर कहा गया है । फिर मरनेके अनन्तर वह वहीं परलोककी कल्पना करता है । वासनाके भीतर अन्य अनेक शरीर और उनके भीतर भी दूसरे-दूसरे शरीर—ये इस संसारमें केलेके वृक्षकी त्वचा ( छिलके वा वल्कल ) के समान एकके पीछे एक प्रतीत होते हैं ( वस्तुतः इस संसारमें कोई सार नहीं है ) । न तो पृथिवी आदि पञ्च महाभूतोंके समुदाय हैं और न जगत्‌की सृष्टिका कोई क्रम ही है । ये सब-के-सब मिथ्या हैं। तथापि मृत और जीवित जीवोंको