संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 118, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता तथा ज्ञानका उत्तम माहात्म्य *
लेकर अभ्यास और वैराग्यके सहयोगसे दुःखरूपिणी इस भयंकर संसार-नदीको पार करना चाहिये। जिसे प्राप्त कर लेनेपर पुनर्जन्म नहीं होता और जहाँ पहुँच जानेपर शोकका अस्तित्व मिट जाता है, वह परम पद ज्ञानद्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है — इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। इस संसारमें जब पुरुषकी शीघ्र मोक्ष-प्राप्तिके उपायके चिन्तनमें प्रवृत्ति होती है, तब वह मोक्षप्राप्तिका पात्र कहा जाता है। उस प्रवृत्तिके प्राप्त हो जानेपर उत्तम कैवल्य-पदकी प्राप्तिमें कष्ट नहीं उठाना पड़ता। उस केवलरूप परमात्माकी प्राप्तिमें धन-सम्पत्ति, मित्र, भाई-बन्धु, हाथ-पैरका संचालन, देशान्तरगमन, शारीरिक कष्ट-सहन और तीर्थसेवन आदि उपकारी नहीं हो सकते। वह तो एक मात्र पुरुषार्थसे साध्य केवल परमात्माकी प्राप्तिकी वासनारूप कर्मसे एवं मनोजयसे प्राप्त किया जा सकता है। सुखपूर्वक सेवन करनेयोग्य आसनपर बैठकर उस परब्रह्मका चिन्तन करनेवाले पुरुषको उपर्युक्त परमपदकी प्राप्ति हो जाती है। फिर तो उसे न शोक करना पड़ता है और न संसारमें उसका पुनर्जन्म ही होता है। जैसे मृगतृष्णामें जलाभास दीखता है, वास्तवमें वहाँ जल नहीं रहता, उसी तरह स्वर्गलोक और मनुष्य-लोकके सम्पूर्ण भावोंके विनाशी होनेके कारण इन दोनों लोकोंमें वास्तविक सुख नहीं है।
इसलिये जो शम और संतोषका साधन है, उस मनोजयकी प्राप्तिके लिये उपाय सोचना चाहिये। उससे वह आनन्द उपलब्ध होता है, जो परमात्माके साथ ऐकात्म्य-सम्बन्धसे मिलता है। अतः देवता, दानव, राक्षस और मनुष्यको बैठते, चलते, गिरते-पड़ते अथवा घूमते हुए सदा ही मनोजय-जनित उस परम सुखको अवश्य प्राप्त करना चाहिये; क्योंकि वह शान्तिरूप विकसित पुष्पोंसे लदे हुए विवेकरूप महान् वृक्षका फल है। पूर्णरूपसे शान्त मन अत्यन्त निर्मल और भ्रमरहित हो जाता है। उस विश्रान्त मनमें किसी प्रकारकी स्पृहा नहीं रह जाती। उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते [हैं।] उस समय वह न तो किसी वस्तुकी अभिलाषा [करता] है और न किसीका त्याग ही करता है।
राघव ! अब मोक्षद्वारपर स्थित रहनेवाले [चार] द्वारपालोंको क्रमशः सुनो, जिनमेंसे एकके प्रति प्रीति हो जानेसे मोक्षद्वारमें प्रविष्ट होनेका अधिकार] प्राप्त हो जाता है। शम मङ्गलमय, शान्तिदायक [और] भ्रमका निराकरण करनेवाला है। शमसे परम कल्याण] की प्राप्ति होती है और शम ही परम पद है। [शमकी] प्राप्तिसे पूर्णतया तृप्त हुए जिस पुरुषका चित्त शमयुक्त] होनेके कारण शीतल एवं निर्मल हो गया है, [उसका] शत्रु भी मित्र बन जाता है। जैसे चन्द्रोदय [से] क्षीरसागरकी शुभ्रता बढ़ जाती है, उसी प्रकार [जिनका] चित्त शमरूपी चन्द्रमासे भलीभाँति शोभित हो [रहा] है, उनकी परम शुद्धताकी अभिवृद्धि होती है। [जिनके] कलङ्करहित मुखचन्द्रमें शमश्री शोभित होती [है, वे] अपने गुणरूप सौन्दर्यसे दूसरेकी इन्द्रियोंको वश [में कर] लेते हैं तथा वे ही कुलीनशिरोमणि एवं वन्दनीय [हैं।] त्रिलोकीकी राज्यलक्ष्मी भी वैसा आनन्द नहीं [प्रदान] कर सकती, जैसी आनन्ददायिनी साम्राज्य-स[म्पत्तिके] सदृश शम-विभूतियाँ होती हैं। लोकमें जितने [शोक,] जितनी दुःसह तृष्णाएँ और जितनी दुःख[प्रद] मानसिक व्यथाएँ हैं, वे सब शान्तचित्तवाले [पुरुषके] निकट जाकर वैसे ही विलीन हो जाती हैं, जैसे [सूर्यकी] किरणोंके सम्पर्कसे अन्धकारका विनाश हो जाता है।] शमपरायण पुरुषके दर्शनसे समस्त प्राणियोंका मन जैसा] आह्लादपूर्ण एवं प्रसन्न होता है, वैसा चन्द्रमाके [दर्शनसे भी] नहीं होता। इस जगत्में जैसे अपनी मातापर [प्राणियोंको] विश्वास रहता है, उसी प्रकार शमयुक्त पुरुषपर [—चाहे वह दुष्ट हो] अथवा धर्मात्मा—सभी प्राणी विश्वास करते [हैं।] इसलिये रघुकुलभूषण राम ! तुम भी अपने मन[को] समस्त शारीरिक क्लेशों तथा मानसिक [दुःखोंसे...]