भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 129

उत्पत्ति-प्रकरण

दृश्य जगत्के मिथ्यात्वका निरूपण, दृश्य ही बन्धन है और उसका निवारण होनेसे ही मोक्ष होता है, इसका प्रतिपादन तथा द्रष्टाके हृदयमें ही दृश्यकी स्थितिका कथन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जिसमें मुमुक्षुओंके व्यवहारोंका ही प्रधानरूपसे वर्णन है, उस मुमुक्षु-व्यवहार-प्रकरणके बाद अब मैं इस उत्पत्ति-प्रकरणका वर्णन करता हूँ । जबतक दृश्य जगत्‌की सत्ता है, तभीतक यह जन्म-मृत्युरूप संसारका बन्धन है । दृश्य-का अभाव हो जानेसे बन्धन कदापि नहीं रह सकता । यह दृश्य जगत् जिस प्रकार उत्पन्न होता है, वह बता रहा हूँ । तुम क्रमशः ध्यान देकर सुनो । संसारमें जो उत्पन्न होता है, वही वृद्धि एवं क्षयको प्राप्त होता है । वही बँधता और मोक्षको प्राप्त होता है तथा वही स्वर्ग या नरकमें पड़ता है । अपने स्वरूपका बोध न होनेसे ही बन्धन है । इसलिये स्वरूपके बोधके लिये ही मैं आगेकी बात बता रहा हूँ ( इससे तुम्हें यह ज्ञात होगा कि यह दृश्य प्रपञ्च कभी हुआ ही नहीं ) । उत्पत्ति आदिका सम्बन्ध इस दृश्य जगत्‌से ही है ( आत्मासे नहीं ) । आत्मा तो दृश्यकी उत्पत्तिसे पहले जैसा रहा है, वैसा ही उसकी उत्पत्तिके बाद भी है ( वह सदा ही एकरस रहता है ) जैसे सुषुप्तिमें स्वप्नके संसारका अभाव हो जाता है, उसी तरह यह जो समस्त चराचर जगत् दिखायी देता है, इसका कल्पके अन्तमें विनाश ( अभाव ) हो जाता है । तत्पश्चात् निष्क्रिय गम्भीर ( अपरिच्छिन्न ), नाम-रूपसे रहित और अव्यक्त कोई अनिर्वचनीय सद् वस्तु ही शेष रह जाती है वह तेजस्तत्त्व नहीं है, क्योंकि उसके रूप नहीं होता । तथा वह तमोमय भी नहीं है, क्योंकि वह स्वयं प्रकाशस्वरूप है। विद्वानोंने व्यवहार-निर्वाहके लिये उस सत्-स्वरूप परमात्माके ऋत, आत्मा, परब्रह्म तथा सत्य इत्यादि नाम रख छोड़े हैं ।

सोनेका बना हुआ कड़ा सोना ही है । उस सोनेसे 'कटक' शब्दका अर्थ ( कडा ) जैसे पृथक् नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार 'जगत्' शब्दका जो अर्थ है वह परब्रह्मपर ही आधारित है, अतः उससे पृथक् नहीं है । जैसे कड़ेका स्वरूप सुवर्णके स्वभावके ही अन्तर्गत है, कड़ेके स्वभावके अन्तर्गत नहीं, उसी प्रकार यह दृश्यमान जगत् भी अपने परिच्छिन्न स्वभावको त्याग देनेपर ब्रह्मभावमें ही प्रतिष्ठित है, 'जगत्' शब्दके अर्थमें नहीं । ( तात्पर्य यह कि सोनेमें ही कड़ेकी कल्पना हुई है, कड़ेमें नहीं । इसी तरह ब्रह्ममें ही जगत्‌की कल्पना हुई है, जगत्‌में नहीं; अतः वह ब्रह्मसे भिन्न नहीं है । ) जैसे मरु-मरीचिकामें प्रतीत होनेवाली नदी अपने भीतर न होनेपर भी चञ्चल तरङ्गोंका विस्तार करती है और वे तरङ्गें सच्ची सी जान पड़ती हैं, उसी प्रकार मन ही इस जगत्रूपी इन्द्रजालकी सम्पत्ति-का विस्तार करता है और वह सम्पत्ति असत् होनेपर भी सत्य-सी प्रतीत होती है । जिसके कारण असत् वस्तु भी सत्-सी प्रतीत होती है, वह माया है । सर्वज्ञ विद्वानोंने उसके अविद्या, संसृति, बन्ध, माया, मोह, महत् और तम आदि अनेक नामोंकी कल्पना की है ।

प्रिय श्रीराम ! दृश्य-प्रपञ्चका अस्तित्व ही द्रष्टाका बन्धन कहा गया है । दृश्यके बलसे ही द्रष्टा बन्धनमें पड़ा है । दृश्यका निवारण हो जानेपर वह उस बन्धनसे मुक्त हो जाता है । 'त्वम्' ( तू ), 'अहम्' ( मैं ) और 'इदम्' ( यह ) इत्यादि रूपोंमें कल्पित जो मिथ्या जगत् है, उसीको दृश्य कहते हैं । जबतक वह दृश्य बना रहता है, तबतक मोक्ष नहीं होता । यदि यह दृश्यजगत् वास्तवमें है, तब तो किसीके लिये उसका