संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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इसलिये ब्रह्माका शरीर पृथ्वी आदि कारणोंसे रहित है। ब्रह्मा अपने कारणभूत परब्रह्म परमात्मासे अभिन्न एवं स्वयं आत्मस्वरूप हैं। श्रीराम! स्वयम्भू ब्रह्माका वह शरीर आतिवाहिक¹ ही है। जो अजन्मा है, उसे आधिभौतिक शरीरकी प्राप्ति हो ही नहीं सकती।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—गुरुदेव! सभी प्राणियोंके एक 'आतिवाहिक' शरीर होता है और दूसरा 'आधिभौतिक'। किंतु ब्रह्माके केवल आतिवाहिक ही शरीर क्यों है?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम! सभी भूत कारणात्मा हैं—पञ्चीकृत भूतोंसे उत्पन्न देह आदिसे युक्त हैं; इसलिये उनके दो-दो शरीर होते हैं; परंतु अजन्मा ब्रह्माके लिये ऐसा कोई कारण नहीं है। इसलिये उनके एक ही आतिवाहिक शरीर है। एकमात्र अजन्मा ब्रह्मा ही सभी जातिके प्राणियोंके परम कारण हैं। उसका दूसरा कोई कारण नहीं है। इसलिये भी उनके एक ही शरीर है। सङ्कल्परूप ही उनका शरीर है। पृथ्वी आदि भूतोंके क्रमशः सम्मिश्रणसे उनके शरीरका निर्माण नहीं हुआ है। वे चिदाकाशस्वरूप आदिप्रजापति ब्रह्मा ही विविध जीवोंकी सृष्टि करके उनका विस्तार करते हैं। वे जीव ब्रह्माके संकल्पके सिवा अन्य कारणोंसे उत्पन्न नहीं हुए हैं। अतः वे भी चिदाकाश-स्वरूप ही हैं। जिस उपादानसे जिसकी उत्पत्ति होती है, वह तद्रूप ही होता है (जैसे मृत्तिकासे निर्मित हुआ घट मृत्तिकारूप ही है)। स्वर्णके कटक-कुण्डल आदि दृष्टान्तोंके द्वारा इस बातका सभीको अनुभव होता है। संसारमें व्यवहार करनेवाले समस्त प्राणियोंमें ब्रह्मा ही सबसे प्रथम चेष्टाशील चेतन भूत हैं। अन्तःकरण ही उनका स्वरूप है। उन्हींसे अहंकारका उदय होता है। जैसे वायुसे हिलना-चलना आदि चेष्टाएँ प्रकट होती हैं, उसी प्रकार उन प्रथम प्रतिस्पन्द (पहले प्रकट हुए चेष्टाशील चेतन भूत) ब्रह्मासे अभिन्न रूपवाली यह सृष्टि प्रकट हुई और फैली है। प्रतिभास ही जिनकी आकृति है, उन ब्रह्मासे उत्पन्न होनेके कारण यह दृश्यमान सृष्टि भी प्रतिभासरूप ही है। फिर भी लोगोंकी दृष्टिमें यह सत्य-सी प्रतीत होती है। इस विषयमें दृष्टान्त है—स्वप्नमें दीखनेवाले स्वप्नान्तरमें प्राप्त होनेवाला स्त्रीका समागम। जैसे स्वप्नमें स्त्री-समागमका स्वप्न देखा जाय तो उससे भी वीर्यपात होता है, उसी प्रकार व्यवहार और प्रयोजनकी सिद्धिकी दृष्टिसे असत् वस्तु भी सत्य वस्तुके समान व्यवहारका प्रकाश करती है। तात्पर्य यह कि स्वप्नमें स्त्रीका समागम जाग्रत्-कालमें सर्वथा असत्य सिद्ध होता है, तो भी उससे सत्यके समान कार्य होता देखा जाता है। इसी प्रकार प्रतिभासमात्र शरीरवाले ब्रह्मासे उत्पन्न यह सृष्टि भी यद्यपि प्रतिभासरूपा ही है, तथापि सत्यके समान प्रयोजनको सिद्ध करती है।
जिनका शरीर पृथ्वी आदि तत्त्वोंसे नहीं बना है, जो चिदाकाशस्वरूप और निराकार हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंके अधिपति स्वयम्भू ब्रह्मा सशरीर पुरुषकी भाँति प्रतीत होते हैं। पृथ्वी आदि तत्त्वोंसे शून्य आकारवाले संकल्प-पुरुष ब्रह्माका शरीर चित्तमात्र है। वे ही तीनों लोकोंकी स्थितिके कारण हैं। स्वयम्भू ब्रह्माका यह संकल्प प्राणियोंके कर्मोंके अनुसार जिस-जिस प्रकारसे विकासको प्राप्त होता है, चिदाकाशस्वरूप आत्मा उसी प्रकारसे प्रतीत होता है। ब्रह्मा मनोमय ही हैं, पृथ्वी-आदि-निर्मित नहीं हैं। इसलिये उनसे उत्पन्न हुआ यह विश्व भी मनोमय ही है; क्योंकि जो जिससे उत्पन्न होता है, वह तद्रूप ही होता है। (जैसे सोनेका बना हुआ कटक-कुण्डल आदि सुवर्णरूप ही होता है।) अजन्मा ब्रह्माके कोई सहकारी कारण
१. अर्चि आदि मार्गके द्वारा लोकान्तरमें पहुँचना 'अतिवहन' कहलाता है। इस अतिवहन कर्ममें कुशल अत्यन्त सूक्ष्म शरीरको 'आतिवाहिक' कहते हैं।