भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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उत्पत्ति-प्रकरण ] * मनके स्वरूपका विवेचन तथा मन एवं मनःकल्पित दृश्य-जगत्की असत्ताका निरूपण * १०१

है, न द्रष्टा, न दर्शन, न शून्य, न जड और न चित् ही सद्रूप है। केवल शान्तस्वरूप ब्रह्म ही सद्रूप है, जो सर्वत्र व्याप्त है।

यह जगत् सृष्टिके आदिमें उत्पन्न नहीं हुआ था, इसलिये इसका अस्तित्व सर्वथा नहीं है। जैसे स्वप्न आदिमें मनसे ही नगरकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार यह जगत् भी मनसे ही उत्पन्न होकर प्रतीतिको विषय हो रहा है। स्वयं मन ही सृष्टिके आदिमें उत्पन्न न होनेके कारण असत्-स्वरूप है, उस असत्-रूप मनसे कल्पित होनेके कारण भी यह जगत् असत् ही है। फिर जिस प्रकार इसका अनुभव होता है, वह बता रहा हूँ, सुनो। मन निरन्तर क्षीण होनेवाले इस दृश्यरूपी दोषका विस्तार करता है। वह स्वयं असत्-रूप ही है, तो भी सत्-सा प्रतीत होनेवाले जगत्की सृष्टि करता है—ठीक उसी तरह, जैसे स्वप्न असत् होता हुआ भी सत्-सा प्रतीत होनेवाले जगत्की सृष्टि करता है। मन ही अपनी इच्छाके अनुसार स्वयं शीघ्र ही शरीरकी कल्पना कर लेता है। वही चिरकालकी भावनासे विस्तारको प्राप्त होकर इस ऐन्द्रजालिक वैभवरूप दृश्य-जगत्का विस्तार करता है। चञ्चल शक्तिसे युक्त होनेके कारण केवल यह मन ही स्वयं स्फुरित होता, उछलता, कूदता, जाता, आता, याचना करता, घूमता, गोते लगाता, संहार करता और अपकर्षको प्राप्त होता है।

श्रीराम ! महाप्रलय होनेपर जब जगत् अति सूक्ष्म रूपसे स्थित होनेके कारण अपने कार्यमें असमर्थ हो जाता है, उस समय वह सम्पूर्ण भावी दृश्यवर्गकी सृष्टिसे पहले विक्षेपरहित शान्तावस्थामें ही शेष रहता है। उस प्रलयकालमें केवल कभी अस्त न होनेवाले सूर्यदेव—स्वयञ्ज्योति, अजन्मा, रोग-शोकसे रहित, सदा सर्वशक्तिमान्, सर्वस्वरूप, परमात्मा महेश्वर ही विराजमान होते हैं। जहाँसे वाणी उन्हें न पाकर लौट आती है अर्थात् जहाँ वाणीकी पहुँच नहीं हो पाती, जो जीवन्मुक्त महात्माओंके द्वारा जाने जाते हैं, साङ्ख्यदर्शनके अनुयायी जिन्हें 'पुरुष' कहते हैं, वेदान्तवादी 'ब्रह्म' नामसे जिनका चिन्तन करते हैं, विज्ञानवेत्ताओंकी दृष्टिमें जो परम निर्मल विज्ञानमात्र हैं, जिन्हें शून्यवादी शून्य कहते हैं, जो सूर्यके प्रकाशके भी प्रकाशक हैं; जैसे नदी-नाले आदिके जल अन्ततोगत्वा महासागरमें ही गिरते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण दृश्यसमूह महाप्रलयकालमें जिनमें ही विलीन होते हैं; जो आकाशमें, विभिन्न शरीरोंमें, प्रस्तरोंमें, जलमें, लताओंमें, धूलिकणोंमें, पर्वतोंमें, वायुमें और पाताल आदि सभी देश, काल एवं वस्तुओंमें समान भावसे स्थित हैं; जिन्होंने आकाशको शून्य पर्वतोंको घनीभूत और जलको द्रवीभूत बनाया है, जगत्‌को दीपककी भाँति प्रकाशित करनेवाले सूर्य जिनके अधीन हैं; जैसे मरुभूमिमें सूर्यकी तपती हुई किरणोंके भीतर जलराशि लहराती दिखायी देती है, उसी प्रकार जिन अत्यन्त व्यापक परमात्मारूपी महासागरमें आविर्भाव और तिरोभाव (उत्पत्ति और प्रलय)—से युक्त त्रिलोकरूपिणी तरङ्ग उठती रहती हैं, जो सम्पूर्ण व्यावहारिक सत्ताओंसे ऊँचे उठे हुए—सर्वविलक्षण पारमार्थिक सत्तासे सम्पन्न हैं, जिनसे ही नियति, देश, काल, चलन, चेष्टा और क्रिया आदि समस्त भावोंको कार्य निर्वाहकी क्षमता प्राप्त हुई है—वे एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही उक्त महाप्रलयके समय शेष रहते हैं। वे परमात्मा उत्पत्ति-स्थिति आदिसे रहित, कभी अस्त न होनेवाले, नित्य प्रकाशमान ज्ञानसे परिपूर्ण एव विकारशून्य अपने स्वरूपमें ही स्थित हैं। वे एकमात्र—अद्वितीय ही हैं। अतएव वे मायासे अनेक विशाल संसारों—अगणित ब्रह्माण्डोंकी रचना करते हुए भी वास्तवमें न कोई कार्य करते हैं और न उनसे कोई चेष्टाएँ ही बनती हैं।

(सर्ग ४-५)


है। मृत्तिकामें घटकी भाँति ब्रह्ममें ही जगत्‌की कल्पना हुई है; इसलिये वह उसीमे स्थित है। घट आदि उपाधियोंके नष्ट होनेपर घटाकाश, मठाकाश आदिकी जो महाकाशमें प्रतिष्ठा होती है, वही आकाशमें आकाशका उदय है। इसी तरह जगत्-दृष्टिका निवारण होकर जो ब्रह्मभावका साक्षात्कार होता है, वही ब्रह्ममें ब्रह्मकी प्रतिष्ठा है।