संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * ब्रह्ममें जगत्का अध्यारोप; जीव एवं जगत्के रूपमें ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन * १०९
प्रारम्भिक कालमें ब्रह्ममें ही इस जगत्का विकास हुआ है। अतः यह उससे भिन्न नहीं है। जैसे द्रवत्व (तरलता) जलरूप ही है, स्पन्दन ( कम्पन ) वायुरूप ही है और जैसे आभास प्रकाशरूप ही है, उसी प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंमें प्रतीत होनेवाला जगत् ब्रह्म-रूप ही है। जिस प्रकार स्वप्न देखनेवाले पुरुषके भीतरका चैतन्य ही ग्राम नगर आदि-जैसा प्रतीत होता है, उसी प्रकार परमात्मामें उसका अपना चिन्मय स्वरूप ही जगत्-सा भासित होता है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! यदि यह दृश्यरूपी विश्व उत्पन्न होकर भी स्वप्नगत जगत्के समान मिथ्या ही है, तो इसकी इतनी सुदृढ़ प्रतीति कैसे हो रही है—यह बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! यह जगत् सर्वात्मक ( ब्रह्ममय ) ही है, ब्रह्मसे भिन्न कदापि नहीं। जगत्-रूपमें जो इसकी प्रतीति होती है, वह सर्वथा असत् है। रघुनन्दन ! यह प्रसिद्ध परमात्मा एक ही है। उसके विषयमें द्वितीय होनेकी कोई कल्पना नहीं है। उस अद्वितीय परमात्मामें यह जगत् जिस प्रकार उत्पन्न हुआ है, वह तुम्हें आगे चलकर बताऊँगा। प्रिय श्रीराम ! उसीसे ये सारे दृश्य-पदार्थ विस्तारको प्राप्त हुए हैं। वह परमात्मा ही यह व्यष्टि और समष्टिरूप जगत् है। दृश्य वस्तुओंके दर्शन और मननीय वस्तुके मननके जो-जो प्रकार हैं, उनके रूपमें वह स्वयं ही उदित और विलीन होता रहता है—उसीके आविर्भाव और तिरोभाव होते रहते हैं।
( सर्ग १०-११ )
ब्रह्ममें जगत्का अध्यारोप, जीव एवं जगत्के रूपमें ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे सुषुप्ति ही स्वप्नवत् प्रतीत होती है, उसी प्रकार ब्रह्म ही इस सृष्टिके रूपमें प्रतीतिक विषय हो रहा है। एक पुरुषकी वासना-मात्रका कार्य होनेसे स्वप्नकी घनी ( सुदृढ़ ) प्रतीति नहीं होती; परंतु यह प्रपञ्च समष्टिकी वासनाका कार्य होनेके कारण इसकी सुदृढ़ एवं क्रमबद्ध प्रतीति होती है। सर्वात्मक ब्रह्म ही इस प्रपञ्चका अधिष्ठान है। असीम प्रकाशस्वरूप जो अनन्त चैतन्यमणि ( ब्रह्म ) है, उसका सत्तामात्र रूप ही यह सम्पूर्ण विश्व है।
पञ्चभूतोंकी जो तन्मात्राएँ हैं, वे ही जगत्का बीज हैं। पञ्चतन्मात्राओंका बीज आदिमाया शक्ति है, जिसका परमात्मासे व्यवधान-रहित ( साक्षात् ) सम्बन्ध है तथा वही जगत्की स्थितिमें हेतु है। इस प्रकार वह चिन्मय, अजन्मा एवं सबका आदिभूत परमात्मा ही मायाद्वारा जगत्का बीज होता है। मायाके हट जानेपर वही अपने विशुद्ध रूपसे सदा अनुभवमें आता है। इसलिये यह जगद्-वैभव चिन्मय परमात्मरूप ही है।
जैसे स्वप्नमें बिना बनाये ही नगर बन जाता है उसी प्रकार महाकाशरूपी महान् वनमें जगद्रूपी वृक्ष बारंबार उत्पन्न होकर नष्ट हो जाता है। जैसे स्वप्न देखनेवाला पुरुष अपने लिये नगरका निर्माण-सा कर लेता है, उसी प्रकार यह चेतन आत्मा भी पृथ्वी आदिकी सृष्टि कर लेता है। वास्तवमें उस समय भी वह अहङ् चेतन आत्मा ही रहता है। जगत्का बीज हैं पञ्चतन्मात्राएँ और उनका बीज है अविनाशी चेतन आत्मा। जो बीज है, उसीको फल समझो ( क्योंकि उपादान कारण और कार्यमें भेद नहीं है )। इसलिये सारा जगत् ब्रह्ममय ही है। जो स्वरूप कल्पित है, वह सत्य कैसे हो सकता है। यदि पञ्चभूतोंकी तन्मात्राएँ ब्रह्मस्वरूपा हैं तो उनके कार्यरूप स्थूल पाँच महाभूतोंको भी ब्रह्म ही समझो। इससे यह सिद्ध हुआ कि सदासे दृढ़मूल यह त्रिलोकी ब्रह्म ही है।
इस प्रकार यह जगत् न कभी उत्पन्न होता है न उत्पन्न हुआ दिखायी देता है। जैसे स्वप्न एवं मनोरथ-