संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्पत्ति-प्रकरण ] * मनका स्वरूप तथा उसकी विभिन्न संज्ञाओंपर विचार * १९३
हो जाता है। प्रभो ! इस लोकमें और वेदमें भी ऐसा सुना जाता है कि कर्म और कर्ता यहाँ क्रमशः एकके-बाद-एक उत्पन्न होकर कार्य-कारणभावसे परस्पर मिले हुए हैं । कर्मके द्वारा कर्ताका निर्माण होता है और कर्तासे कर्मका, जैसे बीजसे अङ्कुर होता है और अङ्कुरसे बीज । यह न्याय लोक और वेदमें भी प्रसिद्ध है । जिस वासनाके कारण जीव इस संसाररूपी पिंजड़ेमें डाला जाता है, उसी वासनाके अनुसार उसे फल भी भोगना पड़ता है । भगवन् ! जाननेयोग्य तत्त्वके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! मुझे ठीक-ठीक बताइये कि जीवका किया हुआ कर्म फलरूपमें अवश्य परिणत होता है या नहीं । यदि कर्मका फल अवश्य मिलता है, तब प्राणियोंके जन्म आदिमें वही हेतु हुआ । फिर आपने उत्पत्तिको अकारण या अज्ञानकल्पित कैसे बताया ? मेरे इस महान् संशयका निवारण कीजिये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! मैं तुम्हें साधुवाद देता हूँ, तुमने मेरे सामने यह बड़ा सुन्दर प्रश्न रक्खा है । सुनो, मैं तुम्हें इसका उत्तर देता हूँ, जिससे पूर्णतया ज्ञानका उदय हो जाता है । यह संकल्प-विकल्पात्मक मनका विकास ही कर्मोंका कारण है—उसीके अनुसार फल प्राप्त होता है । मनके संयोगके बिना किये हुए कर्म फलदायक नहीं होते । सृष्टिके आरम्भमें परम-पदरूपी ब्रह्मसे जब मनरूपी तत्त्व उत्पन्न हुआ, तभी उस मनके संकल्पके अनुसार जीवोंका कर्म भी उत्पन्न हुआ और जीव पूर्ववासनाके अनुसार देहवाला होनेके कारण देहमें अहंभावसे स्थित है । (मनसे ही कर्मकी उत्पत्ति हुई; इसलिये बीज और वृक्षकी भाँति कारण-कार्यरूप मन और कर्म परस्पर अभिन्न हैं ।) जैसे अभिन्नरूपसे स्थित हुए पुष्प और सुगन्धमें यहाँ भेद नहीं है, उसी प्रकार परस्पर अभिन्न मन और कर्ममें भी भेद नहीं है । इस जगत्में क्रियाका होना ही विद्वानोंद्वारा कर्म बताया गया है । उस क्रियाका आश्रयभूत देह भी पहले मन ही था अर्थात् यह देह भी मनका ही संकल्प होनेके कारण मनोरूप ही है । इसी प्रकार क्रिया भी मनका ही संकल्प होनेसे मनका ही स्वरूप है। न ऐसा कोई पर्वत है, न आकाश है, न समुद्र है और न ऐसा कोई लोक ही है, जहाँ किये हुए अपने कर्मोंका फल नहीं प्राप्त होता । तात्पर्य यह कि कर्मोंका फल अवश्यम्भावी है । ज्ञानपूर्वक किया हुआ कर्म चाहे पूर्वजन्मका हो या इस जन्मका, वह क्रियारूप पुरुषार्थ ही पुरुषका परम प्रयत्न है । वह कभी निष्फल नहीं होता । जो मुक्त पुरुष है, उसीके कर्मका नाश होनेपर मनका नाश होता है मनका नाश ही कर्मका अभाव है। जो मुक्त नहीं है, उसके कर्म और मनका नाश कदापि नहीं होता । अग्नि और उष्णताकी भाँति सदा परस्पर मिले हुए चित्त और कर्म--इन दोनोंमेंसे एकका अभाव होनेपर दोनोंका ही अभाव हो जाता है । (सर्ग ९५)
मनका स्वरूप तथा उसकी विभिन्न संज्ञाओंपर विचार
श्रीरामचन्द्रजीने कहा—ब्रह्मन् ! जो जड होकर भी अजड (चेतन-) के समान आकार धारण किये हुए है, उस मनके सङ्कल्पारूढ़ स्वरूपका आप मेरे समक्ष विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! सर्वशक्तिमान्, असीम, महान् विज्ञानानन्दघन परमात्मतत्त्वकी शक्तिसे रचित जो संकल्पमय रूप है, उसको विद्वान् पुरुष मन समझते हैं । वह मन स्वयं भी संकल्पकी सामर्थ्यसे युक्त है । इस लोकमें जैसे गुणीका गुणसे हीन होना सम्भव नहीं, उसी प्रकार मनका कल्पनात्मक क्रियाशक्तिसे रहित होना असम्भव है । एकमात्र संकल्प ही जिसका शरीर है तथा जो नाना प्रकारके विस्तारसे सुशोभित होनेवाला