संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 35, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ें४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *
एकश्लोकी योगवासिष्ठ
( लेखक—तत्त्वचिन्तक स्वामीजी श्रीमनिरुद्धाचार्यजी वेंकटाचार्यजी महाराज )
एक बार भगवान् रामने महर्षि वसिष्ठसे पूछा कि सार्थक एवं सफल जीवनवाले मानवकी पहचान क्या है ? इसके उत्तरमें रघुकुलगुरु ब्रह्मनिष्ठ ब्रह्मर्षि वसिष्ठने जो अल्पाक्षरा किंतु अर्थबहुला, एकश्लोकी वाणी, जिसमें 'बीजे वृक्षमिव' सारा 'योगवासिष्ठ' भरा हुआ है, समुच्चारित की थी, वह सचमुच गागरमें सागरकी तरह योगवासिष्ठका समग्र उपादेय तत्त्व निचोड़कर एक श्लोकमे भर देती है। महर्षि-प्रवरकी अर्थ-भारवती वह वाणी इस प्रकार है—
तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः।
<div align="right">( योगवासिष्ठ )</div>
स जीवति मनो यस्य मननेनोपजीवति ॥
महर्षि वसिष्ठका अनुभूत कथन है कि जीवनतत्त्व, ( प्राणशक्ति ) जिसे 'वैशेषिकदर्शन' ने 'सञ्चाकर्म त्वसद्-विशिष्टाना लिङ्गम' इस सूत्रद्वारा 'अध्यात्म वायु' और सांख्यने 'सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्या वायवः पञ्च' कहकर 'अन्तः-करण-क्रिया' की संज्ञा दी है, मानव, पशु-पक्षी आदि सबमें साधारणतया समान है। किंतु मनुष्यको मृगादि पशु-पक्षियोंसे विभक्तकर उच्चश्रेणीमें समासीन करनेवाली मनन-शक्ति ही है, जिसके विकसित होनेपर ही प्राणी 'मानव' कहला सकता है। महर्षि यास्कने भी निरुक्तमें 'मत्वा कर्माणि सीव्यन्ति इति मनुष्यः' कहकर वासिष्ठी उक्तिका समर्थन किया है।
वेदके मतमें जीवनका अर्थ है—प्राण। यह प्राणिमात्रमे सामान्य है। केवल इसीका विकास जबतक मानवमें है, तबतक मानव जन्तु ही है । संस्कृत भाषाने 'मानव और माणव' के भेदको व्यक्त करते हुए कहा है कि केवल प्राण-शक्तिका विकास-स्थल 'माणव' ( जन्तु-विशेष ) और प्राणशक्ति तथा मनन-शक्ति दोनोंका विकासकेन्द्र मानव है । मानवको द्विपादी जन्तुविशेषकी हीन कक्षासे निकालकर मानवताकी उच्चश्रेणीमें पहुँचानेवाली तो मननशक्ति ही है। वेदने भी मननशक्तिको ही 'मानवता' माना है। अतः 'योगवासिष्ठ' के मतसे मानवता-पालनपूर्वक जीवन-यापन करनेवाला ही मानव है। इसी विशिष्ट उपदेशको आत्मसात् करानेके उच्च उद्देश्यसे समग्र 'योगवासिष्ठ' प्रवृत्त हुआ है। प्रस्तुत विशिष्ट उपदेशको विश्वहितके लिये प्रसारित करनेके कारण ही ग्रन्थका नाम 'वासिष्ठ' रखा गया है। वैदिक भाषामें विशिष्टका बोधक वसिष्ठ शब्द है।
वासिष्ठ-बोध-सार
जग कहते हो जिसे जगमग् ब्रह्म ही है,
जन्मक़ा जगत्के न कारण है क्रम है ।
चित्से अचित्के विकासकी हो आस किसे,
होता कहीं प्रकट प्रकाशसे भी तम है ?
कैसे बना, किसने बनाया, किससे है बना—
यह सब जाननेका व्यर्थ सभी भ्रम है ।
मिथ्या कल्पनाका एक नूतन निकेतन है,
चेतन आकाशमें अचेतनका भ्रम है ॥