संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 370, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपशम-प्रकरण ] * मुक्तिदायक और बन्धनकारक अहंकारका एवं परमात्माके स्वरूपका वर्णन * ३३१
( तात्पर्य यह कि वह समस्त विशेषणों और लक्षणोंसे रहित विशुद्ध आत्मा मन, वाणी और बुद्धिका विषय नहीं है; इसलिये उसे इदंताके द्वारा न कहा जा सकता है न समझाया जा सकता है । अतएव उसका यहाँ निषेधमुखसे वर्णन किया गया है। श्रुतिमें भी उसका निषेधमुखसे वर्णन किया गया है । ) किंतु मनके साथ चक्षु आदि छहों इन्द्रियोंका विषय जो यह दृश्यत्वको प्राप्त जगत् है, वह कुछ भी नहीं है। उससे अतीत जो पद है, वही यथार्थ वस्तु है। जिस प्रकारका यह जगत् है, उस प्रकारके इस जगत्को भलीभाँति जाननेवाले पुरुषके लिये यह समस्त विश्व आत्मस्वरूप ही है, कहीं भी आत्मस्वरूपसे अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है। यह आत्मा ही कठोरता, द्रवता, प्रकाश, स्पन्दन और अवकाश-क्रमसे पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाशरूप सम्पूर्ण जगत्-भावोंमें विद्यमान है । श्रीराम ! पदार्थोंकी जो-जो सत्ता है, वह चेतन आत्माके सिवा दूसरी वस्तु नहीं है; इसलिये जो यह कहता है कि 'मैं आत्मासे अतिरिक्त हूँ', उसके इस कथनको उन्मत्तके प्रलापके समान समझो !
( सर्ग ७२ )
दो प्रकारके मुक्तिदायक अहंकारका और एक प्रकारके बन्धनकारक अहंकारका एवं परमात्माके स्वरूपका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे चिन्तामणि-के तत्त्वको जाननेवाले लोग चिन्तामणिको प्राप्त कर लेते हैं, वैसे ही उपर्युक्त विचार-दृष्टिसे द्वैतभावको त्यागकर आत्माके स्वरूपको जाननेवाले महापुरुष विशुद्ध आत्मस्वरूपको प्राप्त हो जाते हैं । श्रीराम ! अब मैं तुमसे दूसरी दृष्टिका वर्णन करता हूँ; उसे तुम सुनो। मैं ही आकाश हूँ, मैं ही आदित्य हूँ, मैं ही दिशाएँ हूँ, मैं ही अधः हूँ, मैं ही ऊर्ध्व हूँ, मैं ही दैत्य हूँ, मैं ही देव हूँ, मैं ही लोक हूँ, मैं ही चन्द्रमा आदिकी प्रभा हूँ, मैं ही अन्धकार हूँ, मैं ही मेघ हूँ, मैं ही पृथ्वी हूँ, मैं ही समुद्र आदि हूँ एवं रेणु, वायु, अग्नि और यह सारा जगत् भी मैं ही हूँ; तीनों लोकोंमें सब जगह जो परमात्मा स्थित है, वह मैं ही हूँ । उस सर्वरूप परमात्मासे भिन्न परिच्छिन्न मैं कौन हूँ ? मैं कभी परिच्छिन्न नहीं हो सकता । देह आदि भी मुझसे भिन्न क्या हैं ? एक अद्वितीय वस्तु परमात्मामें द्वैत कैसे हो सकता है । कमलनयन निष्पाप श्रीराम ! तुम्हीं बतलाओ, इस प्रकार इस सम्पूर्ण जगत्के आत्मरूपसे स्थित हो जानेपर कौन अपना और कौन पराया रहेगा ? तत्त्वज्ञसे भिन्न ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो उसे यदि प्राप्त हो जाय तो वह हर्ष और विषादसे ग्रस्त हो ? यदि उसको ऐसी वस्तुके आ जानेसे विषाद दिखायी पड़े तो वह तत्त्वज्ञ ही नहीं है, किंतु मूढ़ ही है; क्योंकि ऐसा पुरुष जगन्मद ही होता है, सच्चिदानन्दमय नहीं ।
रघुनन्दन ! दो प्रकारकी अहंकार-दृष्टियाँ सात्त्विक और अत्यन्त निर्मल हैं । उनकी तत्त्वज्ञानसे उत्पत्ति होती है । वे मोक्ष प्रदान करनेवाली और परमार्थस्वरूपा हैं। मैं सबसे परे, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर और विनाशशील सम्पूर्ण पदार्थोंसे अतीत हूँ—यह पहली अहंकार-दृष्टि है तथा जो कुछ है, वह सब मैं ही हूँ—यह दूसरी अहंकार-दृष्टि है । निष्पाप श्रीराम ! इन दोनोंसे भिन्न तीसरी अहंकार-दृष्टि यह है—देह मैं हूँ । इस दृष्टिको तुम केवल दुःखदायिनी ही जानो, यह कभी शान्तिदायिनी नहीं होती । अब तुम इन तीनों ही अहंकारोंको छोड़कर सबके शेषमें रहनेवाले अहम्भावनाशन्य पूर्ण सच्चिदानन्द-स्वरूपका अवलम्बन करके उसी अवलम्बनयोग्य परम-तत्त्वमें निरत हुए ही स्थित रहो, क्योंकि इस मिथ्या