संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३७० | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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अविद्याका कार्य होनेसे विनाशशील अविद्या ही समझना चाहिये । उसका विवेक-वैराग्यपूर्वक यथार्थ ज्ञानद्वारा विनाश हो जानेपर सच्चिदानन्दघन परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।
श्रीराम ! यहाँ दृश्यरूप जगत्के सम्बन्धसे और कल्पनाओंसे रहित, परम शान्त, सबका आत्मस्वरूप केवल एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही है। जिस प्रकार जलसे तरङ्गें प्रकट होती हैं, वैसे ही उस परमात्माके संकल्पसे कलारूप प्रकृति प्रकट होती है। यह प्रकृति सत्त्व, रज, तम—त्रिगुणमयी है। सत्त्व आदि तीन गुणस्वरूप धर्मोंसे युक्त प्रकृति ही अविद्या (माया) है। यही प्राणियोंका संसार है। इस प्रकृतिसे पार हो जाना ही परमपदकी प्राप्ति है। जो कुछ भी यह दृश्य-प्रपञ्च दिखायी पड़ता है, वह सब इसी अविद्याका कार्य होनेसे उसीके आश्रित है। श्रीराम ! ऋषि, मुनि, सिद्ध, दिव्य नाग, विद्याधर, देवता—इनको प्रकृतिके सात्त्विक, अंशस्वरूप जानो। प्रकृतिका जो शुद्ध सत्त्व-अंश है, वह विद्या है; उस विद्यासे अविद्या उसी प्रकार उत्पन्न होती है, जिस प्रकार जलसे बुद्बुद उत्पन्न होते हैं। और जिस प्रकार बुद्बुद जलमें लीन हो जाते हैं, उसी प्रकार उस विद्यामें ही यह अविद्या विलीन भी हो जाती है। जैसे जल और तरङ्गकी द्वित्वभावनासे ही भिन्नता है, वैसे ही विद्या और अविद्या-दृष्टियोंकी भेदभावनासे ही भिन्नता है, वस्तुतः नहीं। जिस प्रकार परमार्थतः जल और तरङ्गकी एक-रूपता ही है उसी प्रकार विद्या और अविद्या भी एक-रूप ही हैं, पृथक् नहीं। वास्तवमें एक परमात्मासे भिन्न विद्या और अविद्या नामकी कोई वस्तु ही नहीं है; अतः विद्या और अविद्या-दृष्टिका परित्याग करनेपर यहाँ जो कुछ अवशिष्ट रहता है, वह परब्रह्म परमात्मा ही वास्तवमें विद्यमान है, दूसरा नहीं; क्योंकि न अविद्या नामका पदार्थ है और न विद्या नामका ही पदार्थ है, इसलिये यह कल्पना व्यर्थ है। वास्तवमें परमात्माको छोड़कर बच रहनेवाला कुछ भी नहीं है; यदि कुछ है तो वह एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही है। जब परमात्मा-के स्वरूपका यथार्थ ज्ञान नहीं रहता, तब वह अज्ञान ही अविद्या कहलाता है और जब यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब वह ज्ञान ही अविद्याक्षय—इस नामसे कहा जाता है। आतप और छायाकी तरह परस्पर-विरुद्ध विद्या और अविद्या दोनोंमेंसे विद्याका अभाव होनेपर अविद्या नामक मिथ्या कल्पना प्रकट होती है, जैसे सूर्यके अस्त हो जानेपर छाया-ही-छाया रह जाती है। श्रीराम ! अविद्याका विनाश हो जानेपर विद्या और अविद्या दोनों ही कल्पनाओंका विनाश हो जाता है। इन दोनोंका अभाव हो जानेपर एक प्राप्तव्य सच्चिदानन्द परब्रह्म ही बच रहता है। जैसे समुद्र तरङ्गोंका और निर्मल मणि रश्मियोंका खजाना है, वैसे ही सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही अनन्त चराचर प्राणियोंका खजाना है। जैसे अनन्त घड़ोंमें एक ही आकाश बाहर-भीतर परिपूर्ण है, उसी प्रकार समस्त जड़-चेतन वस्तुओंमें बाहर और भीतर भी एक अविनाशी सत् वस्तुस्वरूप विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही सदा-सर्वदा परिपूर्ण है। जिस प्रकार अयस्कान्तमणि (चुम्बक) के सकाशमात्रसे जड लोह क्रियाशील हो जाता है, वैसे ही एकमात्र चिन्मय परमात्माके सकाशसे जड देहादि पदार्थ क्रियाशील होते हैं। जगत्के एकमात्र कारण उस चिन्मय परमात्मामें उसकी कल्पनासे ही यह कल्पित दृश्य जगत् स्थित है—ठीक उसी प्रकार, जैसे चित्र-विचित्र चञ्चल तरङ्ग-समूह जलमें स्थित है। वास्तवमें अनन्त आकाशकी तरह निराकार चिन्मय परमात्मामें यह कुछ भी नहीं है।
(सर्ग ८-९)