संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण-प्रकरण पू० ] * शरीर और संसारकी अनिश्चितता तथा भ्रान्तिरूपताका वर्णन * ३९३
संकल्पद्वारा जिस देहसे तुम भ्रमण करते हो, वह तुम्हारी देह कहाँ स्थित है अर्थात् कहीं नहीं। श्रीराम ! ये शरीर जिस प्रकार मानसिक संकल्पसे उत्पन्न—अतएव सत् और असद्रूप हैं, ठीक उसी प्रकार यह प्रस्तुत शरीर भी मानसिक संकल्पसे उत्पन्न—अतएव सद्रूप और असद्रूप हैं। यह मेरा धन है, यह मेरा शरीर है, यह मेरा देश है—इस प्रकारकी जो भ्रमजनित प्रतीति होती है, वह भी अज्ञानसे ही होती है; क्योंकि धन आदि सब कुछ चित्तजनित सङ्कल्पका ही कार्य है । रघुनन्दन ! इस संसारको एक तरहका दीर्घ स्वप्न, दीर्घ चित्तभ्रम या दीर्घ मनोराज्य ही समझना चाहिये। स्वप्न और संकल्पोंसे ( मनोराज्योंसे ) जैसे एक विलक्षण बिना हुए ही जगत्की प्रतीति होती है, वैसे ही यह व्यावहारिक जगत्की स्थिति भी एक प्रकारसे सङ्कल्पजनित एवं विलक्षण ( अनिर्वचनीय ) ही है; क्योंकि वह बिना हुए ही प्रतीत होती है । श्रीराम ! पौरुष-प्रयत्नसे मनको अन्तर्मुख बनानेपर जब परमात्माके तत्त्वका यथार्थ साक्षात्कार हो जाता है, तब यह जगदाकार सङ्कल्प चिन्मय परमात्मरूप ही अनुभव होने लगता है, किंतु यदि उसकी विपरीत रूपसे भावना की जाय तो विपरीत ही अनुभव होने लगता है ( भावनाके अनुसार ही संसार है ) । क्योकि 'यह वह है', 'यह मेरा है' और 'यह मेरा संसार है'—इस प्रकारकी भावना करनेपर देहादि जगद्रूप संकल्प जो सत्य-सा प्रतीत होता है, वह केवल सुदृढ भावनासे ही होता है । दिनके व्यवहारकालमें मनुष्य जैसा अभ्यास करता है, वैसा ही स्वप्नमें उसे दिखलायी पडता है। उसी प्रकार बार-बार जैसी भावना की जाती है, वैसा ही यह संसार दिखलायी देता है । जैसे स्वप्नकालमें थोड़ा-सा समय भी अधिक समय प्रतीत होता है, वैसे ही यह संसार अल्पकालस्थायी और विनाशशील होनेपर भी स्थिर प्रतीत होता है ।
जैसे सूर्यकी किरणोंसे मरुभूमिमें मृगतृष्णा-नदी दिखायी देती है, वैसे ही ये पृथिवी आदि पदार्थ वास्तविक न होनेपर भी संकल्पसे सत्य-से दिखायी देते हैं । जिस प्रकार नेत्रोंके दोषसे आकाशमें मोरपंख दिखायी देते हैं, वैसे ही बिना हुए ही यह जगत् मनके भ्रमसे प्रतीत होता है । किंतु दोषरहित नेत्रसे जैसे आकाशमें मोरपंख नहीं दिखायी देते, वैसे ही यथार्थ ज्ञान होनेपर यह जगत् दिखलायी नहीं पडता । श्रीराम ! जिस प्रकार डरपोक मनुष्य भी अपने कल्पित मनोराज्यके हाथी, बाघ आदिको देखकर भयभीत नहीं होता, क्योकि वह समझता है कि यह मेरी कल्पनाके सिवा और कुछ नहीं है, वैसे ही यथार्थ ज्ञानी पुरुष इस संसारको कल्पित समझकर भयभीत नहीं होता; क्योंकि ये भूत, भविष्य, वर्तमान—तीनो जगत् प्रतीतिमात्र ही है । वे वास्तवमें नही है, इसलिये सत् नहीं हैं और उनकी प्रतीति होती है, इसलिये उनको सर्वथा असत् भी नहीं कह सकतेः अतएव अन्य कल्पनाओंका अभाव ही परमात्माका यथार्थ ज्ञान है । इस संसारमें व्यवहार करनेवाले सभी मनुष्योंको अनेक प्रकारकी आपदाएँ स्वाभाविक ही प्राप्त हुआ करती हैं । क्योकि यह जगत्-समूह वैसे ही उत्पन्न होता है, बढ़ता है और विकसित होता है, जैसे समुद्रमें बुद्बुदोंका समूह; फिर इस विषयमें शोक ही क्या । परमात्मा जो सत्य वस्तु है, वह सदा सत्य ही हैं और यह दृश्य जो असत्य वस्तु हैं, वह सदा असत्य ही हैं; इसलिये मायारूप विकृतिके वैचित्र्यसे प्रतीयमान इस प्रपञ्चमे ऐसी दूसरी कौन वस्तु हैं, जिसके विषयमें शोक किया जाय ?
इसलिये असत्यभूत इस संसारमे तनिक भी आसक्ति नहीं रखनी चाहिये; क्योकि जैसे रज्जुसे बैल दृढ बँध जाता है, वैसे ही आसक्तिसे यह मनुष्य दृढ बँध जाता है । अत निष्पाप श्रीराम ! 'यह सब ब्रह्मरूप ही है' इस प्रकार समझकर तुम आसक्तिरहित हुए इस संसारमें विचरण करो । मनुष्यको विवेक-बुद्धिसे आसक्ति और