भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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पृष्ठ 436

निर्वाण-प्रकरण पू० ] * संसार-चक्रके अवरोधका उपाय, शरीरकी नश्वरता * ३९५


हानि नहीं होती। जिस प्रकार मनोराज्यमें उत्पन्न शरीर आदि पदार्थोंका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी कुछ भी हानि नहीं होती, जिस प्रकार स्वप्नमें उत्पन्न पदार्थोंका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी हानि नहीं होती अथवा जिस प्रकार मृगतृष्णिका-नदीके जलका क्षय या विनाश हो जानेपर वास्तविक जलकी कुछ भी हानि नहीं होती, उसी प्रकार एकमात्र सङ्कल्पसे उत्पन्न, स्वभावतः विनाशशील इस शरीररूपी यन्त्रका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी कुछ भी हानि नहीं होती। अतः शरीरके लिये शोक करना निरर्थक ही है। चित्तके संकल्पसे कल्पित तथा दीर्घकालीन स्वप्नमय इस देहके अलङ्कारोंसे भूषित या आधि-व्याधिसे दूषित हो जानेपर चेतन आत्माकी कुछ भी हानि नहीं है। श्रीराम ! देहका विनाश होनेपर चेतन आत्मा विनष्ट नहीं होता।

अज्ञानरूपी चक्रके ऊपर स्थित हुआ जीवात्मा जिस देहके जन्म-मरणरूपी चक्रको देखता रहता है, वह उत्तरोत्तर अधिक भ्रान्तिको देनेवाला, स्वयं भ्रान्तिरूप, पतनोन्मुख खड्गसे ग्रस्त, भली प्रकार अनर्थ-गर्तमें गिराया गया, हत एवं हन्यमान ही दीख पड़ता है। इसलिये मनुष्यको उत्तम धैर्यका भली प्रकार आश्रय लेकर इस अनादि दृढ़ीभूत भ्रमका परित्याग कर देना चाहिये। मिथ्या अज्ञानके द्वारा एकमात्र सङ्कल्पसे उत्पन्न हुआ यह शरीर सत्य-सा होनेपर भी वास्तवमें असत्य ही है; क्योंकि जो वस्तु अज्ञानसे उत्पन्न हुई है, वह किसी समय भी सत्य नहीं हो सकती। श्रीराम! जड पदार्थके द्वारा जो कुछ किया जाता है, वह किया हुआ नहीं माना जाता, इसलिये यह देह कार्य करता हुआ भी कहीं कुछ भी नहीं करता। जड देह तो इच्छासे रहित है और इस निर्विकार आत्मामें इच्छा रहती नहीं, इसलिये कोई कर्ता है ही नहीं। आत्मा शरीरका द्रष्टामात्र है। अपने शरीररूपी घरसे चित्तरूपी वेतालको हटा देनेपर इस मसाररूपी शून्य नगरमें पुरुष कभी भी नहीं डरता। विमल बुद्धिसे अहंकारकी वासना छोड़कर और अहंकारको सर्वथा भूलकर शीघ्रातिशीघ्र अपनी आत्माका ही अवलम्बन करना चाहिये। अहंकारसे युक्त बुद्धिसे जो क्रिया की जाती है, विषवल्लीके सदृश उसका फल मरणरूप ही होता है। विवेक एवं धैर्यसे रहित जिस मूर्खने अपने अहंकाररूपी महोत्स्रवका अवलम्बन किया, उसे तुम तत्काल विनष्ट हुआ ही समझो। राघव ! जिन बेचारोंको अहंकाररूपी पिशाचने अपने अधीन बना लिया, वे सब नरकरूपी अग्नियोंके इन्धन ही बन गये अर्थात् वे नरककी ज्वालासे जलते रहते हैं। पापशून्य राघव ! 'हा ! हा ! मैं मर गया हूँ', 'मै जल गया हूँ' इत्यादि जो दुःखवृत्तियाँ हैं, वे अहंकाररूपी पिशाचकी ही शक्तियाँ हैं, दूसरेकी नहीं। जिस प्रकार सर्वत्र व्यापक आकाश यहाँ किसीसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र व्यापक आत्मा भी अहंकारसे लिप्त नहीं होता। श्रीराम ! प्राणवायुसे युक्त यह चञ्चल देहरूपी यन्त्र जो कुछ करता एव जो कुछ लेता है वह सब अहंकारकी ही चेष्टा है।

श्रीराम ! जड चित्तका, जो आत्मासे सर्वथा पृथक् है, चेतन आत्माके साथ कभी सम्बन्ध हो ही नहीं सकता। चित्त ही आत्मा है—यो अज्ञानसे ही प्रतीत होता है। यह जो आत्मा है, वह ज्ञानस्वरूप (चैतन्यरूप), अविनाशी, सर्वत्र विद्यमान और व्यापक है, जब कि अहंकाररूप चित्त तो मूर्ख और हृदयवर्ती सबसे बड़ा अज्ञान है। जिस पुरुषका चित्तरूपी वेताल शान्त हो चुका है, ऐसे पुरुषका गुरु, शास्त्र, धन और बन्धु उसी प्रकार उद्धार करनेमें समर्थ हैं, जिस प्रकार अल्प कीचड़में फँसे हुए पशुका मनुष्य उद्धार करनेमें समर्थ हों। इस जगत्रूपी महान् अरण्यमें अपनेद्वारा ही स्वयं दृढ़तासे धैर्य धारणकर अपना उद्धार कर लेना चाहिये। श्रीराम ! मनुष्यको उचित है कि विषयरूपी सर्पोंका बहिष्कार कर दे, आर्योंके मार्गका अनुसरण करे और महावाक्योंके अर्थका भली प्रकार विचार करके अपनी अद्वितीय आत्माका ही आश्रय ले। मनुष्यको अपवित्र, तुच्छ, भाग्यहीन तथा दुष्ट आकृतिवाले इस शरीरके आरामके लिये विषयभोगमें कभी नहीं फँसना चाहिये; क्योंकि इसमें फँसे हुए पुरुषोंकी चिन्तारूपी