भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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१४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *

यो जागर्ति सुषुप्तस्थो यस्य जाग्रन्न विद्यते । यस्य निर्वासनो बोधो जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ यस्य नाहंकृतो भावो यस्य बुद्धिर्न लिप्यते । कुर्वतोऽकुर्वतो वापि स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ यस्योन्मेषनिमेषार्द्धाद्विदः प्रलयसम्भवौ । पश्येत् त्रिलोक्याः स्वसमः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोन्मुक्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः। यः सचित्तोऽपि निश्चित्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥ ( उत्पत्ति-प्रकरण ९ । ४-७, ९-१२ )

'यथायोग्य व्यवहार करते हुए भी जिस पुरुषकी दृष्टिमें यह जगत् ज्यों-का-त्यों बना हुआ ही विलीन हो जाता है और आकाशके समान शून्य प्रतीत होने लगता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो व्यवहारमें लगा हुआ ही एकमात्र बोधनिष्ठा-को प्राप्त होकर जाग्रद्-अवस्थामें भी सुषुप्त पुरुषकी भाँति राग-द्वेष, हर्ष-शोकादिसे रहित हो जाता है, उसे जीवन्मुक्त कहते हैं। जिसके मुखकी कान्ति सुखमें उदित नहीं होती-जगमगाती नहीं और दुःखमें अस्त-फीकी नहीं हो जाती और जो कुछ मिल जाय उसीमें सन्तोषपूर्वक जो जीवन-निर्वाह करता है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है। जो निर्विकार आत्मामें सुषुप्तिकी तरह स्थित रहता हुआ भी अविद्यारूप निद्राका निवारण हो जानेसे सदा जागता रहता है, पर जो जाग्रत् भी नहीं है, भोग-जगत्में सदा सोया हुआ है अर्थात् भोगबुद्धिसे जो किसी भी पदार्थका उपभोग नहीं करता और जिसका ज्ञान वासनारहित है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसमें अहङ्कारका भाव नहीं है, जिसकी बुद्धि कर्म करते समय कर्तृत्वके और कर्म न करते समय अकर्तृत्वके अभिमानसे लिप्त नहीं होती, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो ज्ञानस्वरूप परमात्माके किञ्चित् उन्मेष तथा निमेषमें ही तीनों लोकोंकी प्रलय तथा उत्पत्ति देखता है और जिसका सबके प्रति समान आत्मभाव है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। न तो जिससे लोगोंको उद्वेग होता है और न लोगोंसे जिसको उद्वेग होता है तथा जो हर्ष, अमर्ष और भयसे रहित है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है। जिसकी संसारके प्रति सत्यता-बुद्धि नहीं रही है, जो अवयवयुक्त दीखनेपर भी वस्तुतः अवयव-

रहित है। जो चित्तयुक्त होकर भी वास्तवमें चित्तसे रहित है, वह जीवन्मुक्त कहा जाता है।' जीवन्मुक्तकी इस स्वरूप-व्याख्यासे पता लगता है कि यथार्थ ज्ञान ही जीवन्मुक्तका स्वरूप होता है। केवल मौखिक ज्ञान तो प्रदर्शनमात्र तथा ढोंगकी चीज है।

योगवासिष्ठमें योगके साधन तथा योगसिद्धियोंका एवं योगभूमिकाओंका भी महत्त्वपूर्ण प्रतिपादन है। उनका मर्म बिना अनुभवी योगसिद्ध गुरुके समझमें आना बहुत कठिन है। योगवासिष्ठमें दर्शन तथा योगसम्बन्धी ऐसे-ऐसे शब्द आये हैं, जिनका अर्थ समझना केवल भाषाज्ञानसाध्य नहीं, परन्तु साधन-साध्य है।

योगवासिष्ठमें कर्म और भक्तिका कहीं निषेध नहीं है। कर्मकी तो परमावश्यकता ही बतलायी है। पौरुष कर्ममय ही होता है। अवश्य ही वह कर्म होना चाहिये कामना, आसक्ति तथा अहंकारसे रहित। यद्यपि भक्तिका वैष्णवशास्त्रों-जैसा वर्णन नहीं है, तथापि सदाचार-सत्सङ्गमूलक उपासनाका जगह-जगह प्रतिपादन है। प्रह्लादके प्रसङ्गसे भक्तिकी भी बहुत बातें आयी हैं। भगवान् श्रीरामचन्द्रको पूर्णब्रह्म बतलाकर स्वयं वसिष्ठने नमस्कार किया है। महर्षि भरद्वाजने अपने तथा भगवान् श्रीरामचन्द्रजीमें भेद बतलाते हुए महर्षि वाल्मीकिजीसे कहा है—

श्रीरामचन्द्रजी तो परम योगी, समस्त विश्वके वन्दनीय, देवताओंके ईश्वर, अजन्मा, अविनाशी, विशुद्ध ज्ञान-स्वभाव, समस्त गुणोंके निधान, सम्पूर्ण ऐश्वर्योंके आधार एव तीनों लोकोंके उत्पादन, संरक्षण और अनुग्रह करनेवाले हैं—

स खलु परमयोगी विश्ववन्द्यः सुरेश्वरो जननमरणहीनः शुद्धबोधस्वभावः। सकलगुणनिधानं सन्निधानं रमाया- स्त्रिजगदुदयरक्षानुग्रहाणामधीशः ॥ नि० प्र० पूर्वार्ध ० १२७ । २)

महर्षि विश्वामित्रने भगवान श्रीरामचन्द्रकी बहुत बड़ी महिमाका गान किया है और वसिष्ठादि सभी उसे सुनकर अत्यन्त आह्लादित हुए हैं।

.. इसी श्रीरामचन्द्रजीका अज्ञानी बनकर ज्ञान प्राप्त करनेकी