भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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४१८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त-योगवासिष्ठ

चचेरा भाई 'दुर्योधन' नामसे विख्यात होगा और उस दुर्योधनका 'भीम' नामक द्वितीय पाण्डु-पुत्र वैसा ही प्रतिद्वन्द्वी होगा, जैसे सर्पका प्रतिद्वन्द्वी नकुल। पृथ्वीको अपने-अपने अधिकारमें करनेके लिये परस्पर युद्ध करनेमें तत्पर उन दोनोंकी भयंकर अठारह अक्षौहिणी सेना कुरुक्षेत्रमें होनेवाली महाभारतकी लड़ाईमें इकट्ठी होगी। रघुनन्दन ! महान् गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुनकी देहसे उन सेनाओंको नष्टकर श्रीविष्णुभगवान् (श्रीकृष्ण) पृथ्वीको भारसे मुक्त कर देंगे। युद्धके प्रारम्भमें भगवान् विष्णुका अंश अर्जुन प्राकृतभावमें स्थित होकर हर्ष और शोकसे युक्त मनुष्य-धर्मवाला बन जायगा। दोनों सेनाओंमें पहुँचे हुए और मरनेके लिये तैयार अपने बन्धुओंको देखकर वह अर्जुन विषादको प्राप्त हो जायगा और युद्ध करना अस्वीकार कर देगा। राघव ! उस समय अर्जुनको उपस्थित कार्यकी सिद्धिके लिये श्रीविष्णुभगवान् अपने ज्ञानमय श्रीकृष्णस्वरूपसे इस प्रकार उपदेश देंगे—

'यह आत्मा किसी कालमें भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है; शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता। जो इस आत्माको मारनेवाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा वास्तवमें न तो किसीको मारता है और न किसीके द्वारा मारा जाता है। अनन्त, एकरूप, सत्स्वरूप और आकाशसे भी अत्यन्त सूक्ष्म प्रभावशाली परम शुद्ध आत्माका किससे किस तरह क्या नष्ट होता है ? अर्थात् उसका किसी प्रकार कभी विनाश नहीं होता। अतएव ज्ञानस्वरूप अर्जुन ! तुम आदि और मध्यसे रहित, अनन्त एवं अव्यक्त अपने वास्तविक स्वरूपका अवलोकन करो। तुम अप्रमेय, दोषरहित, चैतन्यस्वरूप, अज, नित्य और विशुद्ध हो।' (सर्ग ५२)


कर्तृत्वभिमानसे रहित पुरुषके कर्मोंसे लिप्त न होनेका निरूपण एवं सङ्गत्याग, ब्रह्मार्पण, ईश्वरार्पण, संन्यास, ज्ञान और योगकी परिभाषा

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—अर्जुन ! तुम स्वयं जरा-मरणसे रहित नित्य चिन्मय आत्मस्वरूप हो। तुम 'मारने-वाले' नहीं हो, अतः इस अभिमानरूप दोषका त्याग कर दो। क्योंकि जिस पुरुषके अन्त:करणमें 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थोंमें और कर्मोंमें लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकोंको मारकर भी वास्तवमें न तो मारता है और न पापसे बँधता है। इसलिये 'अयम्' यानी यह संसार 'सोऽहम्' यानी वह मारनेवाला मैं, 'इदम्' यानी यह देह और 'तन्मे' यानी वे बन्धु आदि मेरे हैं—इस तरहकी अन्तःकरणमें उत्पन्न हुई वृत्तिका त्याग कर दो। क्योंकि भारत ! इसी बुद्धिवृत्तिके कारण 'मैं पापोंसे युक्त हूँ', 'मैं विनाशशील हूँ' इत्यादि भ्रान्तियोंके अधीन होकर तुम चारों ओर सुख-दुःखोंसे संतप्त हो रहे हो। वास्तवमें सम्पूर्ण कर्म अपनी आत्माके अंशरूप गुणोंके द्वारा ही विभागपूर्वक किये जाते हैं; तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकारसे मोहित हो रहा है, वह अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है। महात्मा पुरुषके अन्तःकरणमें 'मैं' नामकी कोई वस्तु नहीं है; फिर तुम्हारे लिये कौन पदार्थ क्लेशकारक है ? अर्थात् कोई नहीं। भारत ! बहुतोंने मिलकर एक साथ जिस कार्यका सम्पादन किया हो, उसमें यदि किसी एकको 'मैंने ही यह किया है' यों अभिमान-जन्य दुःख होता है तो वह हास्यास्पद ही है। क्योंकि कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीरद्वारा भी आसक्तिको त्यागकर अन्त-करणकी शुद्धिके लिये कर्म करते हैं। तथा जिसका शरीर